कथा – संदेश
एक राजा था। एक बार राजा शिकार के लिए गया। काफ़ी देर तक कोई शिकार नही मिला। निराश होकर राजा जंगल में घूमने लगा। तभी राजा ने एक हिरण देखा। हिरण का शिकार करने के लिए राजा उसके पीछे दौड़ने लगा। अपनी जान बचने के लिए हिरण काफ़ी देर तक दौड़ता रहा। आख़िर में उसे अंगूर की लताएँ नज़र आई। हिरण जान बचाने के लिए उनमे छिप गया। बहुत देर तक वह वहां छिपा रहा। फिर उसे विश्वास हो गया कि अब आस पास कोई नही है तो वह आराम से अंगूर की बेल चरने लगा।
राजा हिरण का पीछा करते हुए उधर ही भटक रहा था। जैसे ही उसने हिरण को बेल चरते हुए देखा, उसने तुंरत ही हिरण का शिकार कर दिया। मरते समय हिरण को राजा देख रहा था। राजा को लग रहा था जैसे हिरण कुछ कह रहा हो। हिरण की दशा देखकर राजा अत्यधिक विचलित हो गया और अपने राजमहल लौट आया।
रातभर राजा सोचता रहा कि आख़िर हिरण को देख कर ऐसा क्यों लगा कि वह कुछ कह रहा हो? अगले दिन राजा जब दरबार में पंहुचा, तो उसने अपने मंत्रियो को सारा घटनाक्रम सुनाया और प्रश्न पुछा। एक विद्वान मंत्री ने कहा – महाराज, हिरण के जो हावभाव आप व्यक्त कर रहे है उससे ऐसा लगता है जैसे हिरण कह रहा हो – जो आश्रय देता है और उसके साथ कृतघ्नता करने वाला का हश्र मेरे जैसा होता है। इसलिए किसी को कभी भी किसी के साथ कृतघ्नता नही करनी चाहिए।
मंत्री ने कहा – हे राजन, अंगूर की बेल ने हिरण को आश्रय दिया था, लेकिन जब हिरण ने उसे चरना शुरू किया, तो जान से हाथ धोना पड़ा।
अपने प्रति उपकार करने वाले के प्रति कृतज्ञ रहे ना कि कृतघ्न।