किसी पेड़ के कोटर में एक सांप रहता था। वह बहुत जहरीला था और सबको काटता था। उसके डर से बच्चे वहां खेलते नहीं थे और बड़े-बूढ़े तक उस राह से नहीं गुजरते थे। एक बार एक बौद्ध संन्यासी उस गांव में आए। लोगों ने उनसे अपना दुखड़ा रोया। संन्यासी ने सांप से मिलने का निश्चय किया। सांप के बिल के पास जाकर संन्यासी ने उसे आवाज लगाई और उसके दुष्ट आचरण के लिए उसे आगाह किया।
संन्यासी की बातों का सांप के दिल पर बहुत प्रभाव पड़ा। उसने काटना और फुंफकारना छोड़ दिया। सांप अब पूरी तरह से बदल चुका था। धीरे-धीरे लोगों और बच्चों को जब पता चला कि सांप काटता नहीं है तो वह उसे छेड़ने और पत्थर मारने लगे। कुछ दिनों बाद संन्यासी पुन: उस सांप से मिलने गए तो उसे घायल अवस्था में देखा। संन्यासी के पूछने पर सांप ने सारा हाल कह सुनाया।
वे बोले, ‘मैंने तुम्हें काटने के लिए मना किया था, फुंफकारने के लिए नहीं।
इतने सज्जन   भी मत बन जाओ कि लोग तुम्हारा दुरुपयोग करने लगें।’ बात सांप के समझ में आ गई। उसके बाद से जब भी कोई उसके बिल के पास आता, वह फुंफकारकर उसे भगा देता। उसने काटा किसी को नहीं, लेकिन लोग फिर से उससे डरने लगे थे।