लोकोपदेशक प्रसंग
नदी के किनारे एक घाट का पत्थर हर समय लहरों से टकराता था.  एक धोबी हर रोज उस घाट पर कपडे धोता था. वहां  से थोड़ी ही दूर एक और पत्थर शिवलिंग की तरह सजा बैठा था जिसका हर रोज श्रृंगार होता था और लोग पूजा करते थे . दोनों एक ही पर्वत के अंश थे साथ ही बह कर आये थे.
एक दिन नदी किनारे वाले पत्थर ने शिवलिंग से कहा – “भाई तुम धन्य हो मंदिर में विराजित हो लोग तुम्हरी पूजा करते है और तुम उन्हें आशीर्वाद और सुख शांति देते हो .”
यह सुनकर शिवलिंग ने बहुत ही सरलता से उत्तर दिया उसने उसको समझाया -“मैं तो यहाँ आने वाले को क्षणिक शान्ति  देता हूँ पर आप तो निर्विकार भाव से लोगो का मैल धोते  है , मेरे पास आने की पहली कसौटी तो आप ही है.
यह सुनकर घाट का पत्थर समझ गया की वह भी महत्वहीन नहीं है.
इस दुनिया में हरेक चीज की महता है बस उसे जानना पड़ता है.