महर्षि वशिष्ठ का आश्रम अध्यात्मिक चर्चा एवं सत्संग का एक पवित्र स्थान था. लोग बहुत सारी समस्याओं एवं प्रश्नों के साथ आते थे  एवं सही उत्तर पाकर लौट जाते थे. एक दिन सत्संग जारी था बहुत ही धार्मिक बिषयों पर चर्चा  हो रही थी.
तभी एक वयक्ति ने पूछा ,- ‘मुनिवर कृपया ये बताये की पाप क्या होता है ?’ संयोग से उस दिन बहुत देर हो चुकी थी सूर्य अस्त हो चुके थे और रात हो गयी थी . तब महर्षि वशिष्ठ उस व्यक्ति को अपनी कुटिया से बाहर लेकर आये और पूछा,’ अभी आपको क्या-क्या दिखाई दे रहा है ?’
उस व्यक्ति ने बोला ‘सिर्फ अँधेरा !’.
मुनि ने फिर पूछा ‘और भी कुछ देख पा रहे हो क्या ? ‘
उस व्यक्ति का वही जबाब था कि ‘कुछ नहीं!’
मुनिवर ने तब समझाया कि ‘ पाप इसी अँधेरे के समान होता है,जिस प्रकार अँधेरे में सिर्फ अँधेरा  ही नजर आता है और कुछ भी नजर नहीं आता उसी प्रकार पापी को केवल पाप ही नजर आता है वह भले और बुरे में फर्क नहीं समझ पाता.
उस व्यक्ति को अब अपना उत्तर मिल गया था.