एक बार बहुत सारे अमीर लोग अपने शहर से बहुत दूर अपने वाहनों के साथ तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे. उसी जगह एक बहुत ही निर्धन और अपहिज व्यक्ति भी रहता था, जो उनलोगों के साथ तीर्थ पर तो जाना चाहता था पर एक तो गरीबी  और दूसरी मज़बूरी थी अपंगता.  वह चुप-चाप उनलोगों को जाते हुए देखता  रहा पर कुछ कह नहीं पाया. जब सारे लोग चले गए तो उधर से  एक महात्मा गुजरे . उन्होंने एक निराश और उदास व्यक्ति को देखा  तो उससे उसका कारण जानना चाहा.
उनके पूछने पर वो व्यक्ति बहुत उदास होकर  बोला -‘अगर आज मेरे पास भी तन और धन का सामर्थ्य  होता तो मैं भी आज उनलोगों के साथ तीर्थ पर चला गया होता. ‘
उसकी बातों को सुनकर संत बोले,’ हे !भोले मनुष्य अगर  तुम न जा सके तो कोई बात नहीं, ‘अडसठ तीर्थे हिरदे भीतर कोई बिरले नहायो’.  असल तीर्थ  तो मन के अन्दर होता है अपने अन्दर की  यात्रा करोगे तो ज्यादा पुण्य कमाओगे  और पवित्र हो जाओगे .
संत की इस बात से वो व्यक्ति अब असल तीर्थ का रहस्य जान गया और उसकी उदासी भी दूर हो गयी.