“बर्नार्ड शा  ने कही एक बार कहा था कि ‘मैं ऐसी  सभ्यता का अथवा महानता का क्या करू, जिसमे मुझे किसी चौराहे पर नाचने में शर्म आती हो या प्रतिबन्ध हो.

मुझसे अच्छे तो वे आदिवासी लोग है जो कही भी नाच लेते है.’  समृद्ध व्यक्ति के पास जीवन की नैसर्गिकता को जीने के लिए कोई समय नहीं है क्योंकि समृधि उसे हज़ार चिंताए दे जाती है- उसके अपने सम्बन्ध में तथा उसकी दुनिया के सम्बन्ध में. उसकी संवेदना मरने लगती है ,वह जड़ होता जाता है .

अब पक्षियों का कलरव उसके ह्रदय में कोई उमंग-तरंग नहीं पैदा करता .मोर नाचता है पर उसके भीतर कुछ नाचता नहीं ,फूल खिलते है पर उसका हृदय सुवासित नहीं होता . निसर्ग से दूर होकर घर और कार्यालय की एयरकंडीशनिंग के साथ वो भी कंडीशंड (संस्कारित ) हो जाते है. वो नहीं जानते  है कि समृधि और नैसर्गिकता जब एक दुसरे का आलिंगन करती है तो परम समृधि का जन्म होता है और तुम्हरी इन्द्रिय सजग हो उठती है . तब तुम्हारी आँखे बाहर ही नहीं देखती ,भीतर भी देख सकती है ,कान केवल बाहर ही नहीं अन्दर भी सुन सकते है.