horse and frogएक घोड़ा सरोवर के किनारे जल पीने जाया करता था । उस सरोवर के किनारे रहने वाली मेढकी को घोडे के खुर में लगी हुई नाल बहुत भायी । घोड़ा जब भी पानी पीने आता, मेढकी उसकी नाल और चाल को ललचायी नज़रों से देखती रहती । नाल की चमकने और खट-खट की पगध्वनि ने उसे बहुत आकर्षित किया । धीरे-धीरे उसका विश्वास हो गया कि नाल की बदौलत ही घोड़ा इतनी अच्छी चाल चलता है ।
अतः एक दिन उसने साहस बटोरकर पूछा -“घोड़े भाई यह नाल तुमने कहाँ लगवाई ?”

घोड़े ने आश्चर्यचकित होकर मेढ़की की तरफ देखा और उपेक्षा भरे स्वर में कहा – “अरी मेढकी, यह तुम किसलिए पूछ रही हो ?” मेढकी पुलककर बोली – “मैं भी इसी तरह की नाल लगवाना चाहती हूँ ।”

घोड़ा मेढकी की इस मूर्खता पर और उसके नन्हें से वजूद की तरफ हैरत से देखता रह गया । उसने कौतुहलवश पूछा -“तुम नाल कहाँ लगवाओगी ?”

मेढकी तिनककर बोली, “यह भी तुमने अजीब सवाल किया ? तुम्हें दिखाई नहीं देता कि मेरे पाँव इतने कोमल हैं कि घास पर चलते हुए भी छिलते हैं । सोचती हूँ कि मैं भी नाल जड़वा लूँ तो तुम्हारी तरह दुलकी चला करूँ ।”

मेढ़की की इस शेखी से चिढ़कर घोड़े ने उस पर पाँव रख दिया तो मेढकी एक चीं की आवाज़ के साथ नाल के अंदर ही विलीन हो गई ।अपनी सीमाओं से परे और अपनी हैसियत को  न  पहचान कर उसके विपरीत  व्यवहार करने वालो की दुर्दशा हमेशा  बुरी होती है .