प्रकृति के द्वारा दिया गया हमारे जीवन में पेड़ बहुत अनमोल उपहार है। ये धरती पर हरे सोना के सामान है और हरेक के जीवन में बहुत मायने रखता है। पेड़ों के कुछ महत्व को यहां उल्लेखित किया गया है जो साबित करेंगे कि क्यों पेड़ों को बचाना जीवन बचाना है: दोस्तों जहाँ वृक्ष होते हैँ वहाँ का प्राकृतिक वातावरण अलग ही होता है। पर आज आधुनिकता के दौर में जंगलों की कटाई करके वहाँ उद्योग धन्धे लगाये जा रहे हैं, खदानें खोदी जा रही हैं, रेलमार्ग व सङक मार्ग विकसित किए जा रहे हैं। कंक्रीट के इमारत आकर्षण तो पैदा कर सकती है, लेकिन ऑक्सीजन नहीं। आज के आधुनिकता के दौर में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने इस सदी के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। पर अच्छी बात ये है कि ऐसे उपभोक्तावादी समय में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो संकट को समझ कर प्रकृति से स्वयं के रिश्ते को समझते हैं और लोगों को समझाते भी हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी, लखनऊ में रहने वाले ऐसे ही प्रकृति प्रेमी चंद्र भूषण तिवारी हैं, जिन्होंने पौधारोपड़ को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है, जिनका नाम आम जनता पेड़ वाले बाबा के नाम से बड़े सम्मान से लेता है

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आचार्य चंद्रभूषण तिवारी की जीवन यात्रा

पेड़ वाले बाबा (Pedh Wale Baba) के नाम से प्रसिद्ध आचार्य चंद्रभूषण तिवारी (Acharya Chandra Bhushan Tiwari) की जीवन यात्रा बड़ी ही काफी मर्मस्पर्शी है। उत्तर प्रदेश (Uttarpradesh) के देवरिया जिले में एक छोटे से गांव भंटवा तिवारी में पैदा हुए चंद्र भूषण (Acharya Chandra Bhushan Tiwari) ने पौधारोपड़ के द्वारा एक ऐसी मुहिम शुरू करने का फैसला किया, जिससे उनकी जिंदगी बदल गई। अब ये राजधानी और सूबे के अन्य हिस्सों में पेड़ वाले बाबा के नाम से मशहूर हैं।

आचार्य चंद्रभूषण तिवारी (Acharya Chandra Bhushan Tiwari) ने योर स्टोरी से विशेष बातचीत में अपने जीवन के उन पहलुओं को भी सामने रखा, जिससे आम आदमी कुछ सीख सकता है। बाबा बताते हैं, गांव के जिस स्कूल में पढ़ता था वहां हर शनिवार बालसभा होती थी। मैं भी उसमें हिस्सा लेता था। बाद में मैं अपने गांव में भी बालसभा कराने लगा। इस दौरान मैं लोगों को आम, जामुन और कटहल के पौधे भी देता था। इस काम से गांव में प्रशंसा मिली।

भटवां तिवारी गांव में प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के बाद Acharya Chandra Bhushan Tiwari लखनऊ आ गये। लखनऊ विश्वविद्यालय से इन्होंने स्नातक की उपाधि हासिल की। फिर बीएड किया और फिर इन्हें केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक की नौकरी मिल गई। चंद्र भूषण कहते हैं, कि लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान मैं राजधानी की झुग्गी-झोपडिय़ों में बच्चों के बीच चला जाता था। राजधानी में घर-घर जाकर बच्चों के लिए पुराने कपड़े दान के तौर पर ले आता था। गरीब-बेसहारा बच्चे काफी खुश होते थे। वे कहते हैं, कि 1995 में जिस दौरान वे ओडिशा के केंद्रीय विद्यालय में नौकरी कर रहे थे, वो साल उनकी ज़िंदगी का निर्णायक साल साबित हुआ। लखनऊ के गरीब बच्चों ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी, जिसमें बच्चों ने लिखा अंकल आप कब आओगे, खिलौने और मिठाई कब लाओगे। किताबें कब मिलेंगी। पत्र पढ़ने के बाद तिवारी ने नौकरी छोड़ लखनऊ आने का फैसला कर लिया।

“चंद्र भूषण तिवारी ने दस लाख पौधे लगाने का संकल्प लिया है और अभी तक वे एक लाख पौधे लगा चुके हैं।”

चंद्र भूषण कहते हैं, कि तेजी खतम हो रहे पेड़ों की समस्या विकराल है, इसीलिए संकल्प भी विशाल है। दुनिया रोज-ब-रोज बदल रही है। जैसी पहले थी उससे बेहतर हो रही है। लोग जागृत हो रहे हैं। अपने समाज के बारे में सोचने लगे हैं, एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा, जब लोभ पर त्याग, लाभ पर कर्तव्य विजय पायेगा। पर्यावरण पर मंडराते खतरे को रेखांकित करते हुए चंद्रभूषण तिवारी कहते हैं, कि अभी तक वे एक लाख से अधिक पौधे लगा चुके हैं जबकि उन्होंने अपने जीवन में दस लाख पौधे लगाने का संकल्प लिया है। उनके अनुसार प्रकृति के बिगड़े संतुलन को कायम रखने के लिए लोगों को आगे आकर वृहद स्तर पर पौधे लगाने का काम करना होगा।

चंद्र भूषण खुद तो अधिक से अधिक पौधे लगाते ही हैं, लोगों को भी पौधे लगाने के लिए जागरुक करते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रों का मानवीय विषयों एवं प्रकृति की ओर ध्यान खींचना और वृक्ष को अपनी बेटी मानते हुए हर घर के सामने एक पेड़ लगाकर उस घर से दिली रिश्ता जोडऩा पेड़ वाले बाबा के जीवन का उद्देश्य है। बाबा अपनी मुहिम में कुछ हद तक सफल भी हुए हैं। उनकी इस लगन के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल बी.एल. जोशी ने उन्हें सम्मानित भी किया।

Manoj Kr Gupta
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