हमारे जीवन में कुछ चीजे ऐसी  होती है जिसपर हम लोगों का ध्यान नहीं जाता है जैसे की हमलोगों के घर से निकला कचरा, पर अक्सर हमलोग ये बात नहीं सोचते की इस कचरे से बहुत से भी उपयोगी वस्तुए बनाई जा सकती है और इसे लोग बहुत शौक से खरीदते भी  है, और इस अलग तरह के काम को अपना कैरियर बनाकर पर्यावरण को दूषित होने से बचा रही है वाराणसी (Varanasi) की शिखा शाह (Shikha Shah) |प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने करीब 3 साल पहले ‘स्वच्छ भारत अभियान’ (Swach Bharat Abhiyaan) की शुरुआत की थी। इस अभियान के ज़रिए उन्हाेंने सड़कों पर गंदगी न फैलाने की अपील की थी, जिसमें देश की कई हस्तियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। पीएम मोदी (PM Narendra Modi) से प्रेरित होकर अब आईआईटी मद्रास की पूर्व छात्रा शिखा शाह (Shikha Shah) ने धर्म नगरी ‘वाराणसी’ (Varanasi) की कायापलट का जिम्मा उठाया है। अपनी लाखों की नौकरी छोड़ शिखा (Shikha Shah) ने एक स्टार्टअप की शुरुआत की है,”स्क्रैपशाला” (Scrapsaala) 

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कैसे हुयी स्क्रैप्शाला की शुरुवात

सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ऑफ इंडिया (Central Pollution Control Board of India) के फरवरी 2015 के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिदिन 1.4 लाख टन कचरा उत्पन्न होता है। इस कचरे में बहुत सा हिस्सा बोतलों, गत्ते, डिब्बे, प्लास्टिक का सामान, फलों एवं शब्जियों का छिलका। आज आप हर जगह खाली जगह पर कचरे का अम्बार लगे देख सकते है, यह जानते हुए भी कि इस तरह हर दिन इकट्ठा होता कचरा एक दिन हमारे घर के सामने तक पहुंच जाएगा, हम इसमें बढ़ोतरी करते जाते हैं। पर, बनारस (Varanasi) की शिखा शाह (Shikha Shah) की परवरिश और शिक्षा कुछ ऐसी हुई कि उन्हें इस बढ़ती समस्या से अनजान बने रहना मंजूर ना हुआ और उन्होंने एक सार्थक पहल की।

पर्यावरण विज्ञान से मास्टर्स करने के बाद शिखा (Shikha Shah) को अपने प्रोजेक्ट्स और नौकरियों की वजह से गांवों की समस्याओं के बारे में करीब से जानने का मौका मिला। नौकरी के दौरान तमाम स्थानों पर कई प्रोजेक्ट्स पर काम के समय उन्होंने पर्यावरण के प्रति लोगों की संवेदनहीनता को देखा।आईआईटी, मद्रास में अपनी नौकरी के दौरान वह कई छोटे-बड़े उद्यमियों से मिलीं और स्टार्टअप की चुनौतियों को समझने का मौका मिला। वहां से कुछ अपना और सार्थक करने का विचार आया। शिखा (Shikha Shah) को प्रकृति से बहुत प्यार है। वह नौकरी छोड़कर अपने शहर बनारस (Varanasi) आ गईं और स्क्रैपशाला (Scrapsaala) शुरू करने की योजना बनाई।

तभी से उन्होंने ठान लिया कि कुछ ऐसा करना है, जिससे व्यापार भी हो सके और ज़रूरतमंदों को नौकरी भी मिल सके, साथ ही अपने स्टार्टअप के माध्यम से समाज को स्वच्छता का संदेश भी दिया जा सके। अपनी अच्छी खासी नौकरी को छोड़कर शिखा ने स्क्रैपशाला (Scrapsaala) की सुरुवात की। वेबसाईट योरस्टोरी में छपी खबर के मुताबिक, शिखा ने सबसे पहले अपने घर के कबाड़ से इस मिशन को शुरू किया था।

शिखा बताती हैं कि बचपन से ही उन्होंने अपनी मां को चीजों को रिसाइकल करते देखा था। वह कबाड़ कम से कम निकालने पर जोर देती थीं और कई बार घर के पुराने हो रहे सामान को सजा-धजाकर नया कर देतीं। यह सब शिखा (Shikha Shah) के लिए उनकी स्टार्टअप की प्रेरणा बने और स्क्रैपशाला (Scrapsaala) में अपसाइकलिंग का काम शुरू हुआ। इस तरह शुरू हुआ उनका छोटा सा स्टार्टअप, जिसका नाम रखा गया स्क्रैपशाला (Scrapsaala)। शिखा की राय में लगातार बढ़ते कबाड़ से निजात तभी मिलेगी जब हम उसे कम करने की सोचें। कचरे का दोबारा उपयोग करने के तरीके खोजने होंगे उसे रिसाइकल करना होगा। इसके लिए वह अपने स्टार्टअप के जरिए कोशिश में लगी हैं। उनकी यह अनोखी सोच कई लोगों के लिए प्रेरणा बनी है।

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चुनौतियों से भरा एक काम फिर भी शुरुवात की 

शिखा बताती हैं, ‘स्क्रैपशाला (Scrapsaala) के कॉन्सेप्ट को लेकर घर में किसी ने तुरंत सहमति नहीं दी । लेकिन मां मेरे साथ आईं और मेरी सहेली भी और एक बार शुरुआत होने पर सभी का सपोर्ट मिला। पुराने सामान और कचरे को नए रूप में लाना भी आसान काम नहीं होता। उसे साफ करना, डिजाइन करना भी एक चुनौती होती है। कचरे को लेकर वैसे भी लोगों में एक पूर्वधारणा होती है। तैयार सामान को लेकर लोगों में पहले डाउट था। फिर जब प्रोडक्ट्स पसंद किए गए, तो अब सबका सहयोग मिल रहा है।’ चुनौतियां और भी थीं, जैसे जगह, कारीगर और मैटीरियल। मां मधु शाह और सहेली कृति सिंह के साथ शिखा ने अपने घर से शुरुआत की। आज उनके पास पूरी टीम है। अपसाइकलिंग यानी पुरानी चीजों को नया रूप देने के लिए चीजें शुरुआत में उनके घर से ही मिलीं। शिखा बताती हैं कि अब पड़ोसियों, दोस्तों और परिचितों… सबको ध्यान रहता है। शिखा कहती हैं, ‘अब तो लोग कूरियर से भी मुझे चीजें भेज देते हैं। दोस्त कोई बेकार सामान फेंकने से पहले पूछ लेते हैं।’

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शिखा की टीम में आज कई लोग हैं। हालांकि वे खुद भी डिजाइन करती हैं, लेकिन उनकी टीम के कारीगर भी अपने तरीके से इसमें योगदान देते हैं। वे बताती हैं,‘अब हमारी बड़ी टीम है। इसमें आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के भी लोग हैं। उन्हें यहां एक नियमित आय मिल रही है और सबको अपने ढंग से क्रिएटिव वर्क की पूरी छूट है।’

आज शिखा की स्क्रैपशाला (Scrapsaala) बनारस (Varanasi) ही नहीं, पूरे देश में एक जाना-पहचाना नाम है। यहां पुराने टायर से खूबसूरत फर्नीचर, चॉकलेट-बिस्किट के रैपर से बने खूबसूरत बैग्स, शीशे की बोतलों से लैंपशेड्स, प्लास्टिक की बोतलों से गमले, पुरानी केतली का सजावटी रूप और पुराने गत्ते से वॉल डेकोरेशन के आइटम्स जैसी कई चीजें बनाई जा रही हैं। उनके प्रोडक्ट्स ऑफलाइन और ऑनलाइन उपलब्ध हैं। इसे और आगे ले जाने की योजना है।

स्क्रैपशाला (Scrapsaala) आज उन लोगों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है, जो अपने घर के कबाड़ को या तो बेच दिया करते हैं या फिर सड़क पर फेंक देते हैं, क्योंकि उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि इस कबाड़ से भी लाखों का व्यवसाय किया जा सकता हैं। शिखा आज के युवा के लिए मिसाल है वो खुद तो अपना भविष्य सवांर ही रही है साथ ही दूसरों को भी रोजगार दे रही हैं।

Manoj Kr Gupta

Editor at BiharStory
Manoj Kr Gupta is young professional and passionate writer at BiharStory.in .
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