वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन (WHO) के सर्वे के अनुसार देशभर में लगभग 30 से 35 करोड़ ऐसे जूते-चप्पल हैं जिन्हें हम इस्तमाल नहीं करते हैं और जिन्हें हम फेक देते हैं | वहीं दूसरी ओर 1.5 अरब लोग ऐसे हैं जिन्हें पैर के इन्फेक्शन के दर्द को झेलना पड़ता है, ऐसा सिर्फ उनके असुरक्षित नंगे पैरों के कारण है |हम यहाँ बात कर रहे हैं एक ऐसी ही ऑनलाइन स्टार्टअप कंपनी “Greensole” की जिन्होंने न ही पुराने, घिसे पिटे, बेकार, रद्दी जूते-चप्पलों को एक नया लुक दिया बल्कि इस नए लुक के जूते-चप्पलों से गरीबों के पैर को भी आराम दिया है |  “ग्रीन्सोल” के इस नेक पहल से इस उद्यम द्वारा न सिर्फ  कई लोगों को रोजगार मिला है बल्कि  यह पहल  गरीबों  और वातावरण को भी को ध्यान में रखकर किया गया है |

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न जाने कितने जूते-चप्पलों को हम हर साल फेकते हुए आए हैं | क्या आप भी अपने पुराने, घिस्से-पिटे जूते-चप्पलों फेक देते हैं या फिर किसी जरूरतमंद को देते है ? अगर आप पुराने जूते-चप्पलों को फेक देते हैं तो ऐसा करने से आपकी परेशानी तो ख़त्म हो गयी लेकिन क्या आपने ये सोचा की जूते-चप्पल को फेक देने से आप अपने पर्यावरण को ही हानि पंहुचा रहे है ?

आपके फेके हुए कई जूते-चप्पल ऐसे हैं जो प्लास्टिक या अन्य किसी मटेरियल से बने होते हैं और इनसे पर्यावरण को भारी मात्रा में क्षति पहुंचती है। एक  ऑनलाइन स्टार्टअप कंपनी वर्ष 2014 में दो दोस्त श्रीयंस भंडारी (Shreeyansh Bhandari) और रमेश धामी (Ramesh Dhami) ने मुंबई में शुरू किया था जिसका नाम  “Greensole” है | Greensole ने  52,000 से अधिक पुराने जूते-चप्पलों की मरम्मत कर महाराष्ट्र और गुजरात के जरुरतमंदों, गरीबों, स्कूली बच्चों जो नंगे पाँव रहने को मजबूर हैं उनतक पहुचने का नेक कार्य किया है ।

एक जूते के निर्माण के लिए 65 अलग-अलग 360 भागों को चरणों में बनाया जाता है | लोगों ने इनकी यह अदभुत पहल देखकर उनसे प्रभावित होकर वह अपने घिस्से-पिटे, रद्दी, पुराने जूते-चप्पलों को भारी मात्रा में दान कर “Greensole” के द्वारा अपनी अपनी मदद गरीबों और जरुरतमंदो तक पंहुचा रहे हैं | इस ऑनलाइन स्टार्टअप Greensole के इस नेक और अद्भुत कार्य से न केवल लोग ही प्रभावित हुए बल्कि बड़े-बड़े कॉर्पोरेट्स, जैसे एक्सिस बैंक, इंडियाबुल्स, टाटा पॉवर और DTDC ने उनकी मदद की और प्रत्येक जोड़े के लिए 200 रूपये का भुगतान भी किया।

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ग्रीन्सोल की स्टोरी

श्रीयांश (Shreeyansh  Bhandari) उदयपुर, राजस्थान के रहनेवाले थे और रमेश (Ramesh Dhami) कुमाऊ गडवाल उत्तराखंड के एक छोटे से जिले से है | उन दोनों की मुलाकात मुंबई के प्रियदर्शनी पार्क मैराथन के दौरान हुई थी | हालांकि उनके बीच ((Shreeyansh  Bhandari & Ramesh Dhami) में काफी कम समानताए थी पर मैराथन का धावक होना और ग्रीन्सोल की स्थापना करने का एक समान विचार होना एक नयी पहल की शुरुआत थी |

यह नायाब आईडिया रमेश ने जब अपने मित्र श्रीयांश को बताया तो उन्हें यह सोच बहुत पसंद आई और वह दोनों इस सोच को हकीकत में बदलने के लिए तैयार हो गए | उन्होंने ने अपनी इस बिज़नेस मॉडल को जय हिन्द कॉलेज के प्रतियोगिता में प्रदर्शित  किया जहाँ लोगों ने उनकी यह सोच को खूब सराहा | फिर दोनों ने चप्पले बनाने पर काफी रिसर्च किया |

500 स्क्वायर फीट के एक कमरे में उन्होंने पांच कामगारों को लगाया जहाँ वो बेकार, पुराने जूते-चप्पलों से एक नया सैंडल बनाने का काम शुरू कर दिया | रमेश ने बड़े से बड़े स्थापित जूते-चप्पलों की कंपनियों में जाकर उनकी बारीकियों को समझा और सिखा| श्रीयांश जो “ग्रीन्सोल” की मार्केटिंग डिपार्टमेंट को सँभालते है और जबकि रमेश निर्माण, डिजाईन आदि रिसर्च के कार्यभार को सँभालते हैं | आज इनकी एक बड़ी टीम है जो दिन रात इस पहल को ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुचाने की कोशिश में जुटी है |

श्रीयांश अपने जैसे युवाओं को सफलता का सन्देश देते हुए कहते हैं कि “ जब भी कोई आईडिया हो तो उसके हर अगले स्टेप पे बढते रहो | अपने आस-पास और उस क्षेत्र  के लोगों से बात करो और आईडिया को इम्प्लेमेंट करो” |

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ग्रीन्सोल का  2017 के अंत में एक लाख चप्पल वितरण करने का लक्ष्य है | बड़ी – बड़ी कंपनियों  ने भी  इस मुहीम में उनका साथ दिया और कई संस्थाए ने भी जूते-चप्पल इक्कठा करने में इनकी मदद की | जिस गाँव में उन्हें जूते-चप्पल बाटना रहता है वहाँ पहले एक सर्वे कर किसे कैसी साइज़ की चप्पलों की जरुरत है वैसे चप्पल का निर्माण करते हैं |

ग्रीन्सोल की रिटेलिंग भी होती है जहाँ आप अपने लिए या दान करने के लिए जूते खरीद सकते हैं | ग्रीन्सोल ऑनलाइन भी आपके सुविधा के लिए उपलब्ध है | इन दो दोस्तों के इस नेक सामाजिक पहल को महान दिग्गज रतन टाटा और बरैक ओबामा ने भी सराहा है इनसे इनके भीतर और आत्मविश्वास बढ़ी |

श्रीयांश और रमेश (Shreeyansh Bhandari & Ramesh Dhami) ने निहायत ही एक जरुरी आवश्यता का निर्माण किया है जिनसे एक दर्दनाक कठिनाई दूर की जा सकती है | इन दो दोस्तों की इस प्रभावित आईडिया ने हम पढ़े लिखे नौजवान को प्रेरित करता है की हमारे आस पास रहने वाले पिछड़े जाती के लोगो के मदद के लिए आगे आए |

Abhilasha Singh

Editor at BiharStory.in
Abhilasha Singh as an editor in BiharStory.in, goal is to provide a compelling posts and upto date with a society and culture news.
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