निरंतर प्रयास किसी को कभी असफल नहीं होने देता दुनिया में कोई भी काम ऐसा नहीं जो असंभव हो। अगर मेहनत लगन और कोशिशें की जाए तो सबकुछ मुमकिन है। गरीबी और मुफलिसी के बावजूद कुछ करने की चाहत रखने वाले अपनी मंजिल ढूंढ ही लेते हैं | बिहार की एक बेटी ने जो उन जैसे लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है जो लोग गरीबी और सुविधाओं का रोना रोते है। हमारे देश में आज भी माता-पिता बेटियों के लिए कम सुविधाएँ और अवसर प्रदान करते। मगर जब बेटियां कुछ कर दिखाने की ठान लेती हैं तो अपनी प्रतिभा और क्षमता के बल पर सुविधाओं के बिना भी अवसरों को स्वयं प्राप्त कर लेती हैं। आर्थिक, सामाजिक, रूढ़िवादिता हर बंधन को तोड़ न सिर्फ अपना बल्कि अपने माता-पिता और समाज का नाम रोशन करती है। बिहार की एक बेटी ने जब ऐसा ही मजबूत इरादा बनाया तो गरीबी और अभाव को भी घुटने टेकने पड़े। आज वह सिर्फ बिहार का नहीं बल्कि पूरे देश का नाम रोशन कर रही है।

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बिहार के बेगूसराय (Begusarai, Bihar) जिले से 7 किलोमिटर दूर वीरपुर प्रखण्ड की सरौंजा गाँव निवासी बेबी कुमारी (Baby Kumari) ने गाँव के पोखर से तैराकी कर आज अंतरराष्ट्रीय स्तर (International Level Swimmer) पर अपनी पहचान बना चुकी हैं। गोवा में अंतरराष्ट्रीय आधुनिक पेंटाथलान संघ की ओर से गोवा में आयोजित यूनियन इंटरनेशनल डे पेंटाथलॉन मॉर्डन बैथलॉन वर्ल्ड-2016 में गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया है|वर्ल्ड 2016 में जब एक मछुआरे की बेटी ने गोल्ड मेडल पर अपना कब्ज़ा जमाया तो सबकी आँखे फटी की फटी रह गई।19 से 21 आयु वर्ग की महिला श्रेणी में भारत की ओर से बेबी ने राजस्थान की एक युवती समेत इग्लैंड, श्रीलंका, नेपाल समेत कई अन्य देश के प्रतिभागियों को पछाड़ कर यह कामयाबी हासिल की। उनकी इस उपलब्धि के परिणामस्वरुप उन्हें सी.आर.पी.एफ. में नौकरी मिली और वर्तमान में वह पंजाब में ट्रेनिंग ले रहीं हैं। बेबी 2018 ओलंपिक में भाग लेने की इच्छा रखती हैं।

बेबी (Swimmer, Baby Kumari) एक गरीब मछुआरे परिवार से ताल्लुक रखती हैं। आर्थिक रुप से कमजोर और निःसहाय फूस के टूटे-फूटे घर और दो गायों के अलावा मछली पकड़ कर घर का पालन पोषण करने वाले पिता ने कभी भी बेबी के हौंसलों को पस्त नहीं होने दिया। बेटी जैसे-जैसे कामयाबी की सीढ़ी चढ़ती गई, घर की माली हालत खराब होती गई मगर पिता का हौंसला कम नहीं हुआ। बेबी बचपन में पिता के साथ गाँव में छोटे से तालाब में मछली पकड़ने जाती थी और वहीं से उन्होंने तैराकी की बारिकियों को सीखा। गाँव के ही प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा पूरी कर उन्होंने तैराकी के साथ-साथ अपनी पढ़ाई को जारी रखा। कम संसाधनों के बावजूद उन्होंने कई जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं समेत राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं (International Level Swimmer) में अपनी प्रतिभा के बल पर पहचान बनाई।

दर्जनों गोल्ड मेडल के साथ ही करीब ढाई दर्जन सिल्वर और कांस्य पदक जीत चुकी हैं।

बेबी (Swimmer, Baby Kumari) दर्जनों गोल्ड मेडल के साथ ढ़ाई दर्जन सिल्वर और ब्रौंज मेडल जीत चुकी हैं। वह 2007 से लेकर 2014 तक बिहार चैंम्पियन रह चुकी हैं जिसके लिए उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री और देश के वर्तमान प्रधानमंत्री के हाथों सम्मान भी मिल चुका है।

तमाम चुनौतियों के बीच कुछ करने की चाहत ने बेबी को आज वह पहचान दी है जो बहुत कम लोगों की किस्मत में होता है। बचपन से ही कुछ कर गुजरने की हसरत में सीमित संसाधनों के बावजूद आज बेबी कई लड़कियों के लिए रोल माॅडल है। 12 वर्ष की अवस्था में बेबी ने UNICEF के कैलेंडर में भी स्थान पाया था। बेबी तैराकी के साथ ही साथ पढ़ने में भी एक मेधावी छात्र रही हैं। उनके गाँव वाले और शिक्षक उनकी उपलब्धियों पर फूले नहीं समा रहे हैं। उनके शिक्षकों का मानना है कि यदि इनके प्रतिभा को निखारने के लिए सरकार की तरफ से सहयोग प्राप्त हो तो परिणाम और भी बेहतर मिल सकते हैं। गाँव वाले जहाँ उसे नन्ही जलपरी के नाम से पुकारते हैं, वहीं गाँव में विकास के लिए संसाधनों का नामोनिशान नही है।

विडम्बनाओं और विरोधी परिस्थितियों के बावजूद आज अपनी पहचान बनाने वाली बेटी बेबी उन तमाम अभिभावकों के लिए एक उदाहरण है, जो बेटे और बेटियों में भेदभाव करते हैं। बेबी उस सरकारी तंत्र पर भी प्रश्न चिह्न छोड़ती हैं, जहाँ युवाओं के कौशल विकास के लिए संसाधन और मंच उपलब्ध नहीं कराए जाते। बड़े शहरों और महानगरों में जहाँ तमाम सुविधाओं के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिभा बामुश्किल मिलती है। वहीं छोटे गाँव-शहरों के बच्चे अवसरों को सुविधारहित संसाधनों के बीच भी प्राप्त कर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि ऐसी प्रतिभाओं को निखारने के लिए समुचित कदम उठाए ताकि क्षमता का पूर्ण विकास हो और देश-विदेश में हम गौरव और ख्याती प्राप्त कर सकें।

Manoj Kr Gupta

Editor at BiharStory
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