ना कमी, तुझमें कोई,अब कर ले तू, खुद पे यकीं,
जीतेगा तू, हर कदम,बस करना है, खुद पे यकीं |

विकलांगता कोई अभिशाप नहीं है, न ये आपके पूर्वजन्मों के पापों की सजा है न आपके परिवार को मिला कोई श्राप. वास्तविकता यह है कि इस दुनिया में कोई भी परिपूर्ण नहीं है, कोई न कोई कमी हर इंसान में मौजूद होती है, कुछ नज़र आ जाती है तो कुछ छुपी रहती है. इसी तरह हर इंसान में कुछ न कुछ अलग काबिलियत भी होती है. अपनी कमियों को समझकर उस पर विजय पाना ही हर जिंदगी का लक्ष्य है | आज प्रस्तुत है ऐसी ही प्रेरणा से भरी बसंती कुमारी की स्टोरी जो झारखण्ड के रोड़ाबंद में माध्यमिक स्कूल शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं।

 

Teacher -Basanti Kumari -Jharkhand -BiharStory is best online digital media platform for storytelling - Bihar | India

 हाथों की बजाय  पैरों से लिखती है

बहुत कम लोग होते है जो अपनी कमज़ोरी को सफलता पूर्वक अपनी ताकत में बदल देते है, बसंती (Basanti Kumari) ने अपने विकलांगता को दरकिनार कर एसा कारनामा कर दिखाया की वह केवल खुद के लिए ही नहीं बल्कि पूरे परिवार के लिए वरदान सिद्ध हुईं।जब Basanti Kumari का जन्म हुआ तब उनके दोनों हाथ नहीं थे। उनकी इस विकलांगता के कारण उनके माता-पिता को बहुत सारी सलाह सुनने को मिली। लोग उन्हें सलाह देते कि उनका बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होगा उसकी समस्याएं बढ़ती ही चली जाएंगी। परन्तु उनके माता-पिता उन्हें बहुत प्यार करते थे, वे कभी सपने में नहीं सोच पाते कि बसंती को छोड़ दें।

उन्होने उसे स्कूल से हमेशा दूर रखा क्योंकि वे लिख पाने में असमर्थ थीं। लेकिन जब वे 6 साल की हुई तब उन्होंने अपने माता- पिता को अपनी पढ़ाई शुरू करने के लिए मना लिया था और घर पर ही पढ़ाई करना शुरू किया। पढ़ाई के लिए उनकी ललक ने उन्हें शारीरिक विकलांगता पर विजय पाना सीखा दिया। उन्होंने हाथों की जगह अपने पैरों से लिखना शुरू किया।Teacher -Basanti Kumari -Jharkhand -BiharStory is best online digital media platform for storytelling - Bihar | India

1993 में बसंती ने दसवीं कक्षा की परीक्षा पास की और अपने आसपास के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। आज वे रोड़ाबंद के माध्यमिक स्कूल में कॉन्ट्रैक्ट बेस पर पढ़ा रही हैं। वे चॉक और बोर्ड का इस्तमाल बड़ी ही सहजता से करती हैं, जैसे सामान्य शिक्षक करते हैं। वह अपने पैरों से होमवर्क और एग्ज़ाम की कॉपी भी जाँचती हैं। एक पैर पर खड़े होकर दूसरे पैर से ब्लैकबोर्ड पर लिखना उनके लिए आसान नहीं था। बसंती पूरी लगन और प्यार से बच्चों को पढ़ाती हैं। वह अपने परिवार के लिए एक मात्र कमाने वाली है।

बसंती (Basanti Kumari) ने बाधाओं से लड़कर यह सिद्ध कर दिया है कि वह किसी से कम नहीं। इस कहानी को किसी सहानुभूति की आवश्यकता नहीं है। यह कहानी धैर्य और दृढ़संकल्प की है जिससे वे अपनी सारी अक्षमता को पराजित कर पाईं हैं। यह सरल है कि आप कुछ न करने के बहाने ढूंढ ले पर यह कठिन है कि आप उसका समाधान ढूंढे और आपके पास जो कुछ है उसी में बेहतर करें। बसंती के पास तो बहाना था और वह अपनी विकलांगता को अपनी ढाल बनाकर बंद दरवाजे के पीछे रह सकती थीं। परन्तु उन्होंने न केवल अपनी कमज़ोरी का सामना किया बल्कि उसमें विजय भी प्राप्त की।

अधिकतर लोग अपनी जिंदगी के महत्व को नहीं समझ पाते और बहानों को अपनी ढाल बनाकर अपना जीवन ऐसे ही गुजार देते हैं। बसंती (Basanti Kumari) एक जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे लोग अपनी कमज़ोरियों के बावजूद अपनी जिंदगी को बेहतर ढंग से जीते हैं। बसंती की कहानी से प्रेरणा लेकर आप बहुत सारे विकल्प और अवसर का सही उपयोग कर अपने भाग्य को चुनौती दे सकते हैं और सफलता प्राप्त कर सकते हैं।