हम अक्सर आजकल के डॉक्टर्स के मोटी फीस ऐठने से परेशान रहते है। देखा जाये तो अब तो इस पेशे की इमानदारी पर भी सवाल उठने लगे है। डॉक्टरों के लिए अब मरीज़ को ठीक करने से, मुनाफा कमाना ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। पर हर डॉक्टर ऐसा नहीं होता। इन स्वार्थी डॉक्टरों की भीड़ में एक उदाहरण ऐसा भी है जो भीड़ से बिलकुल अलग है। ये कहानी एक ऐसी महिला की है जिसने अपनी ज़िन्दगी में कई उतार चढ़ाव देखे है। एक झोपड़पट्टी में रहकर सब्जी बेचने से लेकर एक कैंसर विशेषज्ञ बनने तक की उनकी कहानी बिलकुल अनोखी है।उन्‍होंने अपने जीवन मे जातीय भेदभाव का सामना किया। उन्‍होंने अपने जीवन में स्‍त्री होने के नाते भेदभाव का सामना किया। उन्‍होंने गरीबी की कठिनाईयों का सामना किया। उन्‍होंने भाषा के कारण कठिनाईयों का सामना किया। आज उनको सबसे कठिन माने जाने वाले रोग कैंसर का देश के सबसे बड़े डॉक्‍टरों में शुमार किया जाता है। उनका नाम है डॉ. विजयलक्ष्‍मी देशमने को जो किसी परिचय की मुहताज नहीं हैं |

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डॉ. विजयलक्ष्‍मी देशमने (Dr. Vijaylakshmi Deshmane) कर्णाटक (Karnataka) के गुलबंगा की एक झोपड़ पट्टी में पली बढ़ीं। वह कर्णाटक की सबसे पिछड़ी जातियों में से एक से आती थीं जो लोग इस्‍तेमाल किए हुए जूते-चप्‍पल सिलने का काम करते थे। पिता एक मिल में मजदूरी करते थे और मां छोटी सी एक दुकान पर सब्‍जियां बेचती थीं। विजयलक्ष्‍मी ने भी मां के साथ सब्‍जी बेचने का काम किया। जाने कहां से पिता में बेटी को पढ़ाने का हौसला पैदा हो गया। विजयलक्ष्‍मी बताती हैं कि मुझे पढ़ाने की पिता में जो तमन्‍ना थी उसे मैंने अपने नस-नस में भर लिया। मां भी खूब मेहनत करती थीं और मेरे लिए पढ़ने का वक्‍त निकल सके इसका खयाल उन्‍हें हमेशा बना रहता था।

पढ़ाई में अच्‍छा प्रदर्शन देख समाज वाले भी आगे बढ़कर मदद किया करते थे। वह बताती हैं कि कदम-कदम पर किसी न किसी रूप में कोई न कोई भेदभाव भी आ जाता था। पर, वह जूझती थीं। अक्‍सर ऐसा भी होता था कि कोई एक उदार व्‍यक्ति समर्थन या सहायता के लिए आगे आ जाता था। उनकी पढ़ाई लिखाई अपनी ही भाषा में हुई थी। एम.बी.बी.एस. में जब पढ़ाई अंग्रेजी में करनी पड़ रही थी तो बड़ी कठिनाई हुई। वह एम.बी.बी.एस. के पहले वर्ष में फेल कर गईं। पर, अवधारणाओं पर उनकी जो शानदार पकड़ थी उसे उनके प्रोफेसरों ने देखा था। उन्‍हें परीक्षा दोबारा देने का एक विशेष मौका दिया गया। वह बताती हैं कि उन्‍होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और पास कर गईं।

और इस तरह बन गई गरीब कैंसर रोगियों के लिए एक आशा की किरण

रिटायरमेंट के बाद भी वह कर्णाटक कैंसर सोसायटी की वाइस- प्रेसिडेंट (Vice President of Karnataka Cancer Society) हैं। आज वह पंद्रह दिन इस सोसायटी को सेवा देती हैं, तो पंद्रह दिन कैंसर के विरूद्ध और कई सामाजिक बुराईयों के विरूद्ध अलख जगाने के लिए अलग-अलग शोध संस्‍थाओं और सामाजिक संगठनों को समय देती हैं। वह बताती हैं कि स्‍वयं आगे बढ़ने और लोगों की तकलीफ़ दूर करने की प्रेरणा की लौ उनके सीने में हमेशा धधकती रहती थी जिसके माध्‍यम से (Dr. Vijaylakshmi Deshmane) सभी भेदभाव और कठिनाईयों से पार पाया।

डॉ. विजयलक्ष्मी देशमाने (Dr. Vijaylakshmi Deshmane) ने ज़िन्दगी के कई पहलु देखे है। देश के सबसे पिछड़ी हुई जातियो में से एक में जन्म लेने से, झुग्गी झोपड़ियो में रहने तक; सब्जी बेचकर गुज़ारा करने से लेकर एक डॉक्टर बनने तक – उन्होंने सब कुछ अनुभव किया है। और अब वे निःस्वार्थ भाव से समाज सेवा कर रही है।

Manoj Kr Gupta

Editor at BiharStory
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