जीवन में कई बातें ऐसे होती हैं जो दिल पर लग जाती है और उसकी टीस उम्र भर नहीं जाती। अक्सर दिल पर जब कोई बात चुभती है तो इससे व्यक्ति खुद को अपमानित महसूस करता है और कुछ लोग इस अपमान का बदला लेने के लिए खुद को साबित करने में अपनी जिंदगी लगा देते हैं। हम बात कर रहे है आईएएस गोविन्द जायसवाल की जिनको बचपन में अपने दोस्त के घर जाने पर दोस्त पिता ने  उनको बहुत भला बुरा कहकर घर से बहार कर दिया क्युकी इनके पिता  रिक्शा चालाते थे । उनको उस समय कुछ समझ नहीं आया और भी बच्चे तो उनके घर जाते है मगर उनलोगों को तो कभी कुछ नही बोले। ये बात उनके दिल पर जा लगी और उन्होंने अपने मन मे ठान लिया था कि वह अपने परिवार को अब एक सम्मानजनक जीवन देंगे।

गोविन्द के पिता नारायण जायसवाल बनारस में रिक्शा चलते थे। रिक्शा ही उनकी कमाई का एक मात्र साधन था। रिक्शे के दम पर ही सारा घर-परिवार चलता था। गरीबी ऐसी थी कि परिवार के सारे पाँचों सदस्य बस एक ही कमरे में रहते थे। पहनने के लिए ठीक कपडे भी नहीं थे । गोविन्द की माँ बचपन में गुजर गई थीं। तीन बहनें गोविन्द की देखभाल करती पिता सारा दिन रिक्शा चलाते , फिर भी ज्यादा कुछ कमाई नहीं होती थी। बड़ी मुश्किल से दिन कटते थे। बड़ी-बड़ी मुश्किलें झेलकर पिता ने गोविन्द की पढ़ाई जारी रखी। चारों बच्चों की पढ़ाई और खर्चे के लिए पिता ने दिन-रात मेहनत की । कड़ाके की सर्दी हो, तेज़ गर्मी, या फिर ज़ोरदार बरसात, पिता ने रिक्शा चलाया और बच्चों का पेट भरा।

बचपन से ही गोविन्द ने कभी भी पिता और बहनों को निराश नहीं किया। भले ही उसके पास दूसरे बच्चों जैसी सुविधाएं ना हो उसने खूब मन लगाकर पढ़ाई की और हर परीक्षा में अव्वल नंबर लाए। गोविन्द के घर के आसपास कई फैक्ट्रियां थीं। इन फैक्ट्रियों में चलने वाले जेनरेटरों की आवाज़ परिवारवालों को बहुत परेशान करती थी। तेज आवाजों से बचने के लिए गोविन्द कानों में रुई डालकर पढ़ाई करता और तो और , गोविन्द को कुछ लोग अक्सर ताने भी मारकर परेशान करते। उसे पढ़ता -लिखता देखकर आस-पड़ोस के कुछ लोग ताने मारते कि – कितना भी पढ़ लो बेटा, चलाना तो तुम्हें रिक्शा ही है। लेकिन, गोविन्द पर इन बातों और तानों का कोई फर्क नहीं पड़ा।

गरीबी के थपेड़े झेलते किसी तरह जिंदगी आगे बढ़ रही थी कि हालत उस समय और भी बिगड़ गए जब पिता के पांव में सेप्टिक हो गया। सेप्टिक की वजह से पिता का रिक्शा चलाना नामुमकिन हो गया। घर-परिवार चलाने के लिए पिता ने रिक्शा किराये पर दे दिया। घर वालों की भी जिद थी कि वो गोविंद को आईएएस  बनाकर ही मानेंगे। गोविंद की दिल्ली में पढ़ाई के लिए उनके पिता ने अपनी पुश्तैनी जमीन 30000 रुपए में बेच दी थी। लेकिन इससे भी उनका काम नहीं चला तो गोविंद पार्ट टाइम कुछ बच्चों को मैथ का ट्यूशन देने लगे।

उनकी  मेहनत और संकल्प का नतीजा ये निकला कि गोविन्द पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा पास कर ली। गोविन्द ने आईएएस (सामान्य वर्ग) परीक्षा में 48वीं रैंक हासिल किया। गोविन्द ने हिंदी माध्यम से अव्वल नंबर पाने का खिताब भी अपने नाम किया। गोविन्द  जी  की  यह  सफलता  दर्शाती  है  की  कितने  ही  आभाव  क्यों  ना  हो  यदि  दृढ  संकल्प  और  कड़ी मेहनत   से  कोई  अपने  लक्ष्य -प्राप्ति  में  जुट  जाए  तो  उसे  सफलता  ज़रूर  मिलती  है ।

हद इतनी करो कि हद की इन्तेहां हो जाए,
कामयाबी इस तरह मिले कि वो भी एक दास्तां हो जाए।