यह दुनियां बहुत खूबसूरत है, हमारे आसपास की हर वस्तु में एक अलग ही सुंदरता छिपी होती है जिसे देखने के लिए एक अलग नजर की जरुरत होती है | दुनियां में हर चीज का नजारा लेने के लिए हमारे पास आंखों का ही सहारा होता है, लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि बिन आंखों के यह दुनियां कैसी होगी? चारो तरफ अंधेरा ही अंधेरा मालूम होगा | दुनियां की सारी खूबसूरती आंखों के बिना कुछ नहीं है, आंखें ना होने का दुख वही समझ सकता है जिसके पास आंखें नहीं होतीं | थोड़ी देर के लिए अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर देखें दुनियां कैसी लगती है, आंखों के बिना तो सही से चला भी नहीं जा सकता और यही वजह है कि इंसान सबसे ज्यादा रक्षा अपनी आंखों की ही करता है. लेकिन कुछ अभागों की दुनियां में परमात्मा ने ही अंधेरा लिखा होता है जिन्हें आंखें नसीब नहीं होतीं. कई बच्चे इस दुनियां में बिना आंखों के ही आते हैं तो कुछ हादसों में आंखें गंवा बैठते हैं, दुनियां भर में नेत्रहीनों की संख्या काफी अधिक है जिनमें से कई तो जन्मजात ही नेत्रहीन होते हैं |

नेत्रों की आवश्यकता

हमारे देश में प्रति हजार शिशुओंमे 9 शिशु नेत्रहीन जन्मते है और देश में प्रति वर्ष 30 लाख लोगों की मौत होती है। यदि इन 30 लाख लोगों में से सिर्फ एक प्रतिशत याने सिर्फ 30 हजार लोगों ने भी नेत्रदान किया तो हमें हमारे देश में नेत्रहीन व्यक्ति खोजने पर भी नही मिलेगा। पहले के दिनों में सामाजिक विश्वास और अंधविश्वास के चलते लोग आँखे दान करने के बारे में बात तक नहीं करते थे, उनका मानना था की यदि हमने इस जन्म मेंनेत्रदान किया तो अगले जन्म में हम नेत्रहीन पैदा होंगे।

आज भी हर साल दो लाख से ज्यादा कॉर्निया ट्रांसप्लांट की ज़रुरत है और हो पाते हैं केवल 44,000 ट्रांसप्लांट। 515 रजिस्टर्ड संस्थाएं हैं जो आई-बैंक से जुड़े हुए हैं और लोगों को आँखे दान करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। एक व्यक्ति ऐसे भी हैं जो अकेले इस मुहिम के लिए काम कर रहे हैं और जिन्होंने पिछले छह सालों में ट्रांसप्लांट के लिए 200 कॉर्निया एकत्रित किया है वो व्यक्ति है डॉ कुलवंत गौर

शाइन इंडिया फाउंडेशन के माध्यम से चला रहे हैं मुहीम  

एक दिन राजस्थान के आई-बैंक सोसाइटी वालों से डॉ गौर का मिलना हुआ। उन्होंने कहा कि अगर कोई आई डोनेशन प्रोसेस में ट्रेंड हो जाये तो कोटा में काम करना आसान हो जायेगा। इसके बाद डॉ गौर और डॉ संगीता ने मिलकर 15 अगस्त 2011 में ‘शाइन इंडिया फाउंडेशन’ की स्थापना की।  इस संस्था के स्थापना के पहले सभी फण्ड उनके खुद के होते थे, परन्तु ‘शाइन इंडिया फाउंडेशन’ के बाद कुछ कोचिंग इंस्टिट्यूट से उन्हें फण्ड प्राप्त होने लगे। इसके अलावा कुछ बड़ी फैक्ट्रीज ने आपस में मिलकर इस संस्था को CSR के तहत चलाया। फॉउंडेशन का पूरा खर्च लगभग 18-20 लाख सालाना वे उठाते थे। ‘शाइन इंडिया फाउंडेशन’ फ्री में ट्रांसप्लांट करता है और कॉर्निया वाले प्रकार के अंधेपन को दूर करता है। दुर्भाग्यवश अभी तक इन्हें सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिली है।

उनके परिवार और दूसरे लोग भी यही कहते थे कि इस उम्र में क्यों वे समाज सेवा करना चाहते हैं। यह उम्र तो परिवार के लिए पैसे कमाने और सेटल होने का होता है। परन्तु डॉ कुलवंत की सोच बिल्कुल साफ थी उन्हें समाज के लिए ही काम करना था। कुलवंत को आई डोनेशन का काम करते हुए परिवार की ओर व्यक्तिगत समस्याओं से जूझना पड़ा। जब उनके बेटे का पहला जन्मदिन था, उन्हें आई ट्रांसप्लांट के लिए जाना पड़ा। पूरा परिवार उनके खिलाफ़ आक्रोशित था, केवल एक व्यक्ति उनके साथ खड़ा था और वह थीं डॉ संगीता।

धीरे-धीरे सभी लोग उनके काम की सराहना करने लगे परन्तु कोई भी यह नहीं बता रहा था कि उन्हें आगे करना क्या है। उन्हें इसके बारे में कुछ भी नहीं पता था, पता था तो केवल यही कि उन्हें उन लोगों के जीवन में रौशनी लानी हैं जिन्हें कुदरत ने दृष्टि का उपहार नहीं दिया है। उन्हें यह महसूस हुआ कि काम करने के लिए उन्हें ऐसे और लोगों की जरूरत है जो इस नेक काम को बिना किसी स्वार्थ के कर सकें। इसके लिए डॉ गौर ने आई डोनेशन से सम्बंधित वर्कशॉप, प्रदर्शनी, नाटक, स्लोगन प्रतियोगिता का आयोजन अलग-अलग स्कूलों, कोचिंग इंस्टिट्यूट के बाहर, मॉल्स में और रेलवे स्टेशन के बाहर किया। हर समय कुछ ऐसे लोग जुड़ते चले गए जो समाज के लिए कुछ करना चाहते थे। इससे डॉ गौर का आत्मविश्वास बढ़ा।

पहले साल में ही इस संस्था ने 190 जोड़े आंखे दान से प्राप्त की, दूसरे साल 44 जोड़े, तीसरे साल 53 जोड़े और इस वर्ष 63 जोड़े। इस संस्था से प्रेरित होकर दूसरी संस्थाएं भी इस काम को आगे बढ़ाने में लग गई हैं। बातचीत के अंत में डॉ गौर बताते हैं — “अंग दान जीवन के बीज अंकुरित करने का एक रास्ता है। किसी का अनुपयोगी हिस्सा किसी के जीवन को खूबसूरत बना सकता है। हम सभी को इस जीवन में प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि हम जरूरतमंदों को अपने अंग दान करेंगे।

“न कुछ लेकर आये थे, न कुछ लेकर जाएंगे। 

जाते-जाते भी इस दुनिया को अपनी आंखें देकर जायेंगे”