आज कोई व्यक्ति नहीं, कोई शख्सियत नहीं न कोई संस्थान जिसे हम मिसाल की तरह पेश करना चाहते हैं| ऐसे प्रयास को लेकर सामने आए हैं, जिनसे पता चलता है कि भारत के गुमनाम और पिछड़े गांवों-शहरों में शिक्षा के साथ-साथ कला और दूसरी तमाम मुहिम भी बेहद संजीदगी के साथ चल रही है| और सिर्फ चल ही नहीं रही, फल-फूल भी रही है| देश में भी, देश के बाहर भी| हम बिहार को बेहद पिछड़े इलाकों में गिनते हैं| यह बिहार का अभिशाप है और हमारी भूल| जब हम बिहार के सुदूर गांव सुजाता का रुख करते हैं तो पता चलता है कि जिस तरह से साहित्य के क्षेत्र में बिहार सर्वोपरि है ठीक उसी तरह कलाओं के क्षेत्र में भी बिहार ने अपना सिक्का जमाया है|

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निरंजन पब्लिक वेलफेयर ट्रस्ट के माध्यम से स्कूल चलता है

बिहार में बोधगया (Bodhgaya, Bihar) के पास मौजूद सुजाता गांव में “निरंजन पब्लिक वेलफेयर स्कूल” (Niranjan Public Welfare) स्थित है| यह एक प्राइमरी पाठशाला है, जिसे एक एनजीओ द्वारा संचालित किया जाता है| एनजीओ का नाम निरंजन पब्लिक वेलफेयर ट्रस्ट (Niranjan Public Welfare Trust) है| यह स्कूल महज़ कोई पाठशाला नहीं है, भित्ति चित्रों का जीता-जागता घर है|

साल 2006 में टोक्यो के टोक्यो गाकूगेई विश्वविद्यालय के लगभग 50 छात्र इस गाँव में आए| उन्होंने पार्ट-टाइम नौकरी से जुटाए गए पैसे निरंजन पब्लिक वेलफेयर स्कूल (Niranjan Public Welfare) की इमारत खड़ी करने के लिए डोनेट कर दिए| उन पैसों से इस स्कूल की नींव रखी गयी| बाद में कई शिक्षक और कार्यकर्ता जुड़ते गये| स्वेछा से कार्य करने वाले भी जुटे और साल 2010 आते-आते इस स्कूल में प्राइमरी शिक्षा पाने वाले बच्चों की संख्या 400 तक पहुंच गयी|

वाल आर्ट फेस्टिवल

अब भारत के एक गुमनाम गांव सुजाता में स्थित यह स्कूल (Niranjan Public Welfare) कलाओं का एक घर बन चुका है| हर साल इस स्कूल में वाल आर्ट फेस्टिवल आयोजित किया जाता है, जहां भारत और जापान के कई कलाकार हिस्सा लेते हैं| कलाकार इस स्कूल में आते हैं| तीन हफ्ते रुकते हैं और स्कूल की दीवारों को कैनवास की तरह इस्तेमाल में लाते हैं|

इसके साथ-साथ कलाकार बच्चों से बातचीत करते हैं, उन्हें कला की बारीकियां समझाते हैं और कलाओं के प्रसार के लिए तरह-तरह की कार्यशालाएं भी आयोजित करते हैं| इस स्कूल की हरेक दीवार किसी बड़ी पेंटिंग की तरह दिखती है. स्कूल में शायद ही कोई जगह खाली हो जहां कोई चित्र न बना हो या कोई कलाकृति न उकेरी गयी हो| अव्वल तो यह कि स्कूल की दीवारों पर बने कुछ चित्र मिट्टी और कीचड़ से बनाए गए हैं| बाकी में रंगों का उपयोग है| इसके आयोजकों को उम्मीद है कि कला और संस्कृति के आदान-प्रदान के माध्यम से यह कार्यक्रम गरीबी, अशिक्षा और रोज़गार जैसी मुश्किलों से लड़ने में मददगार साबित होगा|

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कीचड़ से चित्र बनाने का आइडिया

यूसूके असाई, यह नाम है उस चित्रकार का जो पिछले तीन सालों से लगातार इस वाल आर्ट फेस्टिवल (Wall Art Festival) में शिरकत कर रहा है| कीचड़ से चित्र बनाने का आइडिया यूसूके का ही था| बच्चों के साथ मिलकर यूसूके ने हल्की मिटटी जुटाई, उसका घोल तैयार किया और रंग दिया दीवारों को| फेस्टिवल (Wall Art Festival) ख़त्म होने के बाद बच्चों के साथ मिलकर यूसूके ने दीवारों को धो भी दिया ताकि रंगनुमा मिट्टी वापिस ज़मीन का हिस्सा बन जाए|

कला ही सिर्फ वह क्षेत्र नहीं है जहां इस स्कूल (Niranjan Public Welfare) ने अपना सिक्का जमाने की कोशिश की है. पारंपरिक रूप से शिक्षा भी वह क्षेत्र हैं जहां इस स्कूल की मिसाल दी जा सकती है. सुजाता और आसपास के गांव के बच्चे इस स्कूल में पढ़ते हैं| बेहद गरीब घरों के बच्चे और बेहद न्यूनतम फीस में कुछ विशेष परिस्थितियों में मुफ्त में भी| फिलहाल यह प्रयास अब महाराष्ट्र के कुछ गाँवों की तरफ बढ़ चुका है और सुजाता स्कूल के प्रिंसिपल देवेन्द्र पाठक और बच्चों की ख्वाहिश है कि यह फिर से घूमकर वापिस उनके आँगन में आए|

niraj kumar

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