ब्रेल लिपि के सहारे दुष्टिहिन व्यक्ति पढ़-लिख कर आगे बढ़ सकता है आत्मनिर्भर बन सकता है लेकिन इन दुष्टिहिन ग्रामीण महिलाओं के लिए ब्रेल लिपि उतनी सहायक नही हो सकती है | गांवो में पढ़ी-लिखी इन महिलाओं ने खेती-बाड़ी के बारे में बचपन से ही सब कुछ सुन और समझ रखा था | लेकिन देखा कुछ नही था | मजबूरी यह कि खेती के अलावा कुछ और करना चाहे तो कर नही सकती थी | काश ,खेती में ब्रेल लिपि जैसी कोई तकनीक होती | लेकिन मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले की इन ग्रामीण दुष्टिहींन की दाद देनी पड़ेगी , जो सब्जियां उगा कर आर्थिक निर्भरता हासिल कर रही है | बीज , पोधों , पतियों ,फल-फूलो को छू कर पहचानने की कला इन्होने बड़े जतन से विकसित कर ली है|

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ऐसे हुई शुरुआत :इस बदलाव की प्रेरक बनी सिहोरा ब्लॉक के गांव जाली की तारा बाई (Tara Bai)| पचास की उम्र पार कर चुकी तारा बाई बचपन से दुर्ष्टिहिन है | छह महीने की उम्र में आँखों की रौशनी चली गई | दुष्टिहीनता के कारण शादी नही हुई | जैसे जैसे समय बीता खुद को परिवार पर बोझ मानने लगी मजबूर थीं | क्या करती लेकिन कुछ करना जरुर चाह रही थीं | खेती के अलावा कुछ कर भी नही सकती थीं | खेती करना मुश्किल था | बागवानी का विचार आया | इसके लिए घर के बगल ही पर्याप्त जमीन भी मुहैया थीं | खुद ही सब्जिया उगाने की ठानी लेकिन दुर्ष्टिहीनता आड़े आई |

बन गई बात : उसी समय एनजीओ के कार्यकर्ता गांव में पहुचें , जो दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कम कर रहे थे | तारा बाई (Tara Bai) ने उनसे मन की बात बताई | एनजीओ ने इसके लिए जबलपुर कृषि विशवविधालय से संपर्क किया बात बन गई | कृषि विश्वविद्यालय तारा बाई को बागवानी-सब्जी उत्पाद की बिशेष ट्रेनिग देने को तैयार हो गया | तारा की ट्रेनिग शुरू हो गई | तारा बताती है , पहले हम कही भी पौधे लगा देते थे ,लेकिन ट्रेनिग के बाद हमे पता चला की क्यारी उतर-दक्षिण दिशा में बनाना चाहिए | इससे पौधों पर धुप सीधी नही पड़ती | इसके साथ ही सब्जी के अच्छे बीज भी हमे दिए गए | हमने पौधों-सब्जियां को छू कर पहचानना सिखा | खरपतवार हटाना सिखा | पौधों की देखरेख करना सीखा | आज गांव आस-पास की 12 दृष्टिहीन महिलाए समूह बनकर सब्जियों का उत्पाद कर रही है |

बन गई आत्मनिर्भर : तारा बाई बताती है कि दो साल पहले तक दिव्यांग पेंशन के रूप में मिलने वाले 300 रूपए के सहारे जिंदगी क्त रही थी | लेकिन खेती के आधुनिक तरीके सीखकर वः आज परिवार की भी आर्थिक आधार दे रही है | तारा बाई लहसुन , अदरक ,मिर्च के बीज से खरपतवार उखार लेती है ,वो भी पौधों को बिना नुकसान पहुचाए | पौधों की पतियां को छूकर समझ जाती है कि पौधा किस सब्जी का है | तारा से प्रेरणा ले और सीख कर आज इलाके के अन्य दुर्ष्टिहिन महिला-पुरुष भी काम करने लगे है | सभी ने एक समूह बना लिया है | घर के आस-पास छोटे-छोटे टुकड़ों में सब्जियां उगाते है | पौधे की देख भाल करते है | उत्पाद को सामूहिक रूप में एकत्र कर रोजाना शहर की सब्जी मंडियों को भेज देते हैं | प्रत्येक सदस्य को हर माह तीन-चार हजार रुपए तक कमाई आसानी से हो जाती है | समूह में शामिल सुनीता बाई ने बताया कि हमने सोचा भी नही था कि सब्जियां हमारी इतनी मदद कर सकती हैं |

सब्जी के साथ फूलो की भी खेती : जॉली के साथ ही बुधुआ गाँव में भी दिव्याग महिलाएं सब्जियां उगा रही हैं | 65 वर्षीय रज्जो बाई भी नेत्रहीन हैं और अपनी जमीन सब्जियां उगा रही है बुधुआ की दुर्ष्टिहींन अनामिका आंगन में सब्जी के साथ ही गेंदे के फुल की भी खेती कर रही हैं |

साभार – दैनिक  जागरण