वैसे तो लोगों के पास भगवान का दिया हुआ सबकुछ होता है पर कुछ कर गुजरने की चाहत दिल मै नही होती | वही कुछ वैसे भी है जिन्होंने  शारीरिक क्षमता नहीं होने  को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और अपने आत्म विश्वाश के बल पर अपने क्षेत्र में एक अलग मुकाम बना लिए हैं | हमारी धरती पर एसे सैकड़ो उदाहरण मिल जायेंगे जिन्होंने विकलांगता नामक अभिशाप को अपने बाल-बूते वरदान में बदल दिया हो | कुछ इस तरह के ही शख्स हैं  बिहार के पूर्णिया जिले के निरंजन झा  जो दृष्टिहीन होने के बावजूद भी समाज में शिक्षा का दीप जला कर समाज के लिए एक मिसाल पेश कर रहे हैं |

आज  टीन के शेड में गरीबी की दंश झेल रहे हैं निरंजन झा

पूर्णिया शहर के गुलाबबाग शानिमंदिर मोहल्ले के रहने वाले निरंजन झा की दोनों आंखों की रोशनी बचपन में हीं किसी बीमारी के कारण चली गई थी | उस वक्त निरंजन झा तीसरी कक्षा में थे | निरंजन ने अपने इस दृष्टिहीन दिव्यांगता को खुद पर कभी हावी नहीं होने दिया और आज तक न हीं कभी अपने परिवार तथा समाज पर बोझ बने | इन्होंने अपने सामने आने वाली हर-एक बाधा को बखूबी अपने अंदाज़ में हल किया | ये अपने अदम्य हौसले की बदौलत समाज में सम्मान के साथ जी रहे हैं | आज  टीन के शेड में गरीबी की दंश झेल रहे 37 वर्षीय दिव्यांग निरंजन झा आज के दिनों में किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं | लोग निरंजन को मास्टर साहब के नाम से सम्मान के साथ पुकारते हैं |

ब्रेल लिपि पद्धति का अविष्कार करने वाले लुई ब्रेल की कहानी से ली प्रेरणा

निरंजन ने लुई ब्रेल की कहानी से प्रेरणा ली और ब्रेल लिपि से पढ़ना सीखा। कुछ दिनों तक तो उन्होंने एक स्कूल चलाया लेकिन बाद में घर पर ही ट्यूशन पढ़ाने लगे। निरंजन झा जितने धैर्यवान हैं उतने ही साहसी। दोनों आंखों की रोशनी चली जाने के बावजूद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी, बल्कि अपने हौसलों को और बुलंद कर उन्होंने समाज के लिए कुछ कर गुजरने की मन बना लिया। अपनी निष्ठा और एकाग्रता के बदौलत उन्होंने इस दो विषयों में अधित से अधिक ज्ञान अर्जित कर बारहवीं कक्षा तक के छात्रों को भौतिक विज्ञान और गणित की टयूशन देना शुरू कर दिया।

बच्चों को पढ़ाने के लिए निरंजन झा ब्लैक बोर्ड का नहीं करते इस्तेमाल

निरंजन की कक्षा काफी चटख और जीवंत रंगों से रंगी होती है निरंजन झा भले हीं उसे देख नहीं सकते हैं मगर यहां का रंगीन माहौल और विद्यार्थियों के मनोदशा उन्हें हमेशा उत्साहित करती रहती है | निरंजन जब अपने छात्रों को ‘प्रकाश के गुण’ विषय के बारे में पढ़ाते हैं तब वे शब्दों को पिरो कर विद्यार्थियों के सामने ऐसी तस्वीर बना देते हैं जिसे समझाने के लिए बाकी शिक्षकों को ब्लैक-बोर्ड का सहारा लेना पड़ता है पर निरंजन झा को नहीं |

 मुफ्त में पढ़ाते हैं अनाथ और गरीब बच्चों

हालांकि निरंजन झा बहुत ज्यादा नहीं कमा पाते हैं, करीब 50 विद्यार्थियों को पढ़ा कर 1500 से 2000 रूपये तक हीं हर महीना कमाने वाले निरंजन झा खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं | खुद गरीबी का दंश झेल रहे निरंजन झा  को मालूम है की गरीब परिवार के लोगों को खाना तो ठीक से नसीब नहीं होता तो  अपने बच्चों के पढ़ाई के लिए क्या खर्च करेंगे | इसीलिए वे अनाथ और गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाते हैं |

किसी पर बोझ नहीं बनते खुद करते है सारा काम

निरंजन झा की भाभी शिवानी झा का कहना है कि निरंजन झा बचपन से दिव्यांग होने के बावजूद अपना सारा काम खुद कर लेते हैं, पढ़ाने के अलावा वे रेडियो भी खुद ठीक करते हैं | और फुर्सत के समय  में टीवी या रेडियो सुना करते हैं | अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने कहा कि रेडियो शिक्षा को बढ़ावा देने का बहुत ही कारगर माध्यम है, लोकल रेडियो स्टेशन को अपने चैनलों पर शिक्षात्मक एवं ज्ञान-वर्धक प्रोग्रामों को शुरू करना चाहिए | जिससे अधिक से अधिक छात्र लाभ ले सके |

निरंजन झा अपने अदम्य हौसले की बदौलत समाज में सम्मान के साथ जी रहे हैं | निरंजन झा की संघर्ष भरी कहानी एसी है की जिसे पढ़ कर हर कोई प्रेरित हो जाता है | दिव्यांगता के बावजूद जिस तरह निरंजन झा बच्चों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं ये काफी सराहनीय है | बचपन से दृष्टिहीन होने के बावजूद निरंजन झा ने अपने अदम्य हौसले के बदौलत समाज में सम्मान के साथ जीना सीखा है |

niraj kumar

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
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