समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए किसी की सिफारिश  की जरुरत नहीं होती है ज़रूरत होती है खुद पर विश्वास की | अगर अपने-आप पर भरोसा हो तो हौसलों की उड़ान भरकर न केवल कामयाबी हासिल की जा सकती है बल्कि शोहरत भी बटोरी जा सकती है | कुछ एसा  ही कर दिखाया है बिहार की कुछ दलित महिलाओं ने जिन्होंने समाज की परवाह किये बिना बिहार ही नहीं देश की पहली महिला बैंड पार्टी नारी गुंजन सरगम म्यूजिकल बैंड बना डाली |

(Naari Gunjan Sargam Mahila Band) -Savita Devi -BiharStory is best online digital media platform for storytelling - Bihar | India

बिहार (Bihar) की राजधानी पटना (Patna) से तीन किलोमीटर की दुरी पर स्थित दानापुर (Danapur) के ढिबरा गाँव की 12 महिलाओं ने नारी शशक्तिकरण (Women Empowerment) का बेजोड़ उदाहरण पेश किया है जो कम पढ़ी-लिखी तथा महादलित वर्ग से ताल्लुक रखती है, पर है अपने इरादों की पक्की| वे महिलाएं नारी गूंजन सरगम महिला बैंड (Naari Gunjan Sargam Mahila Band) के जरिए देश भर में वाहवाही बटोर रही हैं | इस बैंड में अधेड़ उम्र की महिलाएं भी शामिल है | महादलित वर्ग से ताल्लुक रखने वाली ये महिलाएं कभी दो वक्त की रोटी के लिए खेतों में दैनिक मजदूर की तरह काम करती थी लेकिन आज बैंड ने उन्हें एक अलग पहचान दिला दी है | बैंड मास्टर सविता देवी, अनीता, सोना, ललिता अपने काम के जरिए अपने गांव और प्रदेश में महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment)की अनोखी मिसाल पेश की है |

इनके बुलंद हौसलों के आगे समाज के ठेकेदार भी टिक नहीं पाए

जीस क्षेत्र में पुरुषों का दबदबा हो और अगर उस क्षेत्र में महिलाएं अगर कामयाबी के झंडे गाड़े तो समाज के ठेकेदारों के दिल में हलचल होगी हीं | हालांकि यह सब इतना आसान नहीं था | नारी गूंजन महिला सरगम बैंड (Naari Gunjan Sargam Mahila Band) की शुरुआत करने की बात सुनते ही पहले तो लोगों ने खूब चुटकी ली, उनका मजाक उड़ाया लेकिन कहते हैं इरादे पक्कें हो तो दुनिया की किसी हंसी और नकारात्मक टिप्पणियों का कोई असर नहीं होता और सफलता ज्यादा दूर नहीं होती |

बैंड मास्टर सविता देवी (Savita Devi) के मुताबिक जब हमने बैंड बनाने और वाद्ययंत्रों को बजाने का फैसला किया तो गांव के पुरुषों के अलावा महिलाओं ने भी खूब विरोध किया लेकिन हम डटे रहे | हम अपने घर और खेत का काम निबटाने का बाद रोजाना एक घंटे की प्रैक्टिस करते थे | अब हम अपने परफॉर्मेंस के दौरान मस्ती में बैंड बजाते हैं, समाज या पुरुषों के तानों की परवाह नहीं करते |

एक एनजीओ की मदद से इन महिलाओं ने दिन-रात मेहनत करके एक साल में बैंड बाजे में इस्तेमाल होने वाले म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट को बजाना सीख लिया | उन्होंने अपना प्रयास अगस्त 2013 से शुरु किया और अपने बिहार का पहला महिला बैंड़ तैयार कर लिया | इस काम में उनकी मदद की महादलितों के बीच काम करने वाली जानी-मानी सोशल वर्कर और पद्मश्री सुधा वर्गीज ने | जब सुधा वर्गीज ने उन्हें बैंड बनाने के लिए कहा तो वे महिलाएं बोल पड़ी-हमसे नहीं होगा दीदी | लेकिन सुधा वर्गीज के लगातार प्रोत्साहन और मदद के कारण ही इन महिलाओं ने चूल्हा-चौका करते हुए बैंड को तैयार कर लिया |

रोजाना 100 रूपए कमाने वाली अब रोजाना 500 से 2000 कमाती है

नारी गूंजन महिला सरगम बैंड की सदस्य गांव वालों के ताने को सहते हुए उन्होंने अपनी कोशिश जारी रखी  फिर गांव-मोहल्ला होते हुए शहर की ओर रुख किया और पुरुषों के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में उन्हें चुनौती दे डाली | अब उन्हें देशभर से शादी से लेकर अन्य समारोहों में  बैंड बजाने का बुलावा मिलता है | बड़े होटलों में उनके परफॉर्मेंस रखे जा रहे हैं | वे पटना से दिल्ली पहुंच गई और अब उनका अगला पड़ाव विदेशों में धूम मचाने का है | पहले जहां वे दिहाड़ी मजदूरी से 100 रुपए रोजाना कमाती थी अब एक परफॉर्मेंस पर 500 से 2000 रुपए तक कमा लेती हैं |

समाज में बुराइयों से लड़ने का भी अनोखा तरीका है इनका

नारी गूंजन महिला सरगम बैंड (Naari Gunjan Sargam Mahila Band) में शामिल महिलाएं को इस बैंड के जरिए अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ अपने बच्चों को भी पढ़ाने का हौसला मिला है | कई महिलाएं तो अब अपनी बेटियों को भी इसी क्षेत्र में लाना चाहती हैं | इन महिलाओँ ने अपने (Naari Gunjan Sargam Mahila Band) को सामाजिक बुराईयों से लड़ने का हथियार भी बना लिया है | गांव में जब कोई पति अपनी पत्नी को पीटता है तो वे उनके घर के सामने बैंड बजाना शुरु कर देती है जिससे पूरे गांववालों का ध्यान इस मुद्दे पर खींचा जा सके |

niraj kumar

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एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
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