आज आप किसी भी चौक-चौराहे या किसी धार्मिक स्थल पर जायेगें तो अनायास हीं आपकी नजर वहां भीख मांगते भिखारियों पर पर ही जाएगी और आप उन भिखारियो पर दया दिखाते हुए कुछ रूपए उसके पात्र में डाल देंगे | क्या आपके दिए पैसे से वो भीख मांगना छोड़ देंगे, किसी गरीब को भीख देकर आप एक दिन के लिए उसका पेट भर सकते हैं लेकिन किसी गरीब को रोटी कमाना सिखाकर आप ज़िंदगी भर के लिए उसकी भूख मिटा सकते हैं |

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कुछ इस तरह का हीं काम कर रहे है, उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के रहने वाले शरद पटेल | 28 वर्षीय शरद पटेल ‘बदलाव’ नाम से एक मुहीम चला रहे |

शरद पटेल बनना तो चाहते थे डॉक्टर

शरद पटेल (Sharad Patel) उत्तर प्रदेश (Uttarpradesh) के हरदोई जिले के मिरजागंज गांव के रहने वाले है | पिता मिश्रीलाल पेशे से किसान और मां असरकली देवी हाउस वाइफ थीं | शरद पटेल (Sharad Patel) का बचपन पिता की फिक्स इनकम न होने के कारण अच्छे से नहीं बीता तथा  बहुत मुश्किल हालात में भाई-बहनों की पढ़ाई पूरी हुई |

वर्ष 2003 में शरद पटेल हाईस्कूल में थे, उसी समय मां को ब्लड कैंसर हो गया जिनका इलाज लखनऊ (Lucknow, Uttarpradesh) के विवेकानंद हॉस्पिटल में ट्रीटमेंट चल रहा था शरद पटेल प्रतिदिन हरदोई से लखनऊ (Lucknow, Uttarpradesh) मां को देखने आया करते थे |उस समय घर में पैसे की काफी तंगी थी, 3 साल तक चले इलाज के बाद 3 सितंबर 2003 को मां का देहांत हो गया | इस घटना के बाद शरद पटेल (Sharad Patel) ने फैसला किया कि एक दिन डॉक्टर बनकर गरीबों का फ्री इलाज करूंगा | इसी वजह से इंटर के बाद शरद पटेल ने बीएससी की पढ़ाई की, ताकि डॉक्टर बन सकूं| लेकिन शरद पटेल ये ख्वाहिश पूरी न हो सकी |

दरअसल शरद पटेल (Sharad Patel) 2013 में जब मास्टर ऑफ सोशल वर्क में एडमिशन लिए तो तो समय-समय पर वे अपने घर जाते थे, तो चारबाग़ स्टेशन के पास एक नत्था होटल है जिसके करीब कई भिखारी बैठे रहते थे और नशीले पदार्थों का सेवन करते थे | तो उनको देखकर लगा कि इनके खाने की कुछ व्यवस्था करनी चाहिये | वही पर एक भिखारी ने कहा की मुझे 10 रुपये दे दीजिये भूख लगी है | शरद पटेल उसे पैसे तो  नहीं दिए पर  होटल में ले जाकर  खाना खिला दिए |

शरद पटेल (Sharad Patel) दिमाग में यह तो पहले से ही था कि खाने की भिखारियों के लिए व्यवस्था की जानी चाहिए, लेकिन इस समय शरद पटेल  को लगा की खाना खिला देना ही इस समस्या समुचित समाधान नहीं है | शरद पटेल को लगा कि भिखारियों को प्रशिक्षित  करना चाहिए जिससे कि वह आत्मनिर्भर हो सकें,  इसी सोच के साथ शरद पटेल ने  2 अक्टूबर 2014 में भिक्षा-वृत्ति मुक्ति अभियान चलाया जो आज तक चल रहा है।

चंदे से मिले पैसे से करते हैं मदद

अभी तक शरद पटेल को किसी भी तरह का सरकारी मदद या अनुदान नहीं मिला है, मदद नहीं मिलने के कारण  शरद पटेल भिखारियों के लिए चंदा करते हैं इसके अलावा कई भिखारियों के राशनकार्ड और आधारकार्ड बनवाये लेकिन कुछ और करने के लिए आगे बड़े तो कोई सपोर्ट नही मिला सरकार से लेकर जिला अधिकारी तक | हमारे प्रयास से 22 लोग बेग्गींग छोड़कर छोटे छोटे कार्य कर रहे हैं जैसे 5 लोग रिक्शा चला रहे है यह प्रयास भी हमारा ही था |

 नुक्कड़ नाटक के माध्यम से करते हैं जागरूक

शरद पटेल (Sharad Patel) भिक्षावृत्ति छोड़ चुके लोगों के साथ मिलकर भिक्षुओं को जागरूक करते हैं। उनके साथ काम करने वाले श्रवण का कहना है कि बचपन में माता-पिता का निधन हो गया। बड़ी बहन ने पति के साथ मिलकर एपी सेन रोड स्थित आवास को हड़प लिया। बहन मुझे शाहजहांपुर अपने घर लेकर चली गई। वहां काम कराते और प्रताडि़त भी करते थे। राजधानी आकर 10 साल से भीख मांग रहा था, लेकिन गत दो वर्ष से अब गर्मी में सड़क के किनारे पानी पिलाने और फिर होटल में काम करने लगा हूं |शरद पटेल ने अभी तक  100 से ज्यादा भिखारियों को आत्म निर्भर बनाकर उनकी लाइफ चेंज कर दी है

अब भीख के लिए नहीं मेहनत के लिए बढ़ते हैं हाथ

रिक्शा चालक प्रकाश ने बताया कि चारबाग के सुदामापुरी का रहने वाला हूं और मेरी उम्र करीब 57 साल है। पहले मैं हनुमान सेतु व शनि मंदिर के सामने भिक्षा के लिए हाथ बढ़ाता था, लेकिन अब रिक्शा चलाकर मेहनत से पैसे कमाता हूं।

Niraj Kumar