दोस्तों संघर्ष हमारे जीवन का सबसे बड़ा वरदान है। वह हमें यह भी सिखाता है कि भले ही यह संसार दुखों से भरा हुआ है, लेकिन उन दुखों पर काबू पाने के तरीके भी यहाँ अनेकों है संघर्ष की चाबी जीवन के सभी बंद दरवाज़े खोल देती है और आगे बढ़ने के नए रास्ते भी दिखाती है हमारी आज की कहानी भी एक महिला की है जो एक ट्रेन दुर्घटना में अपना दोनों हाथ गंवा दी थी इसके बावजूद वो हिम्मत नहीं हारी और आज वो मशहुर फूट पेंटर है | जी हाँ दोस्तों हम बात कर रहे हैं गोरखपुर की शीला शर्मा की जो परिस्थितियों से डर कर जीने का हौसला छोड़ देने के जगह पर अपनी कामयाबी की इबारत रंगीन कुचियों से लिख डाली |

अपने पैर और मुंह से कूँची पकड़ कर पेंटिंग करती है

शीला शर्मा गोरखपुर के एक मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती हैं, शीला शर्मा 4 साल की छोटी उम्र में हीं एक ट्रेन दुर्घटना में अपनी मां और अपने दोनों हाथ खो दिये थे | इस दुर्घटना में शीला शर्मा के  दोनों हाथों के साथ-साथ पैर की तीन अंगुलिया भी कट गयीं थी | लगभग सबकुछ ख़त्म हो जाने के बावजूद   उसके बाद जैसे-जैसे शीला की उम्र बढ़ती गयी उनका हौसला भी बढ़ता गया और अपने उन्हीं हौसलों को आकार देने के लिए उन्होंने रंगों और कूचियों से खेलना शुरू कर दिया |आगे चलकर शीला ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से आर्ट्स में स्तातक किया और पैरों से पेंटिंग बनानी शुरू कर दी | शीला पेंटिंग करते समय अपने पैरों और मुंह दोनों का इस्तेमाल करती हैं | शीला कुछ दिन दिल्ली में भी रहीं और वहां के रहन-सहन और कलाकारों की प्रतिभा देखकर प्रभावित हुईं |

लेकिन फिर भी दिल्ली में मन नहीं लगा और वो अपने शहर लखनऊ वापिस लौट गईं। यहां आकर उनकी मुलाकात सुधीर से हुई और सुधीर-शीला की शादी हो गई। शीला शादी के बाद भी अपने रंगों से दूर नहीं हुईं साथ ही सुधीर के उत्साहवर्धन और साथ ने उनकी कलाकारी को निखारने का काम किया। वो रंगों और कूचियों को अपनी अंगुलयों में दबाये आगे बढ़ती रहीं। साथ ही शीला ने परिवार की जिम्मेदारियों को भी पूरी ईमानदारी से निभाया, फिर बात चाहे किचन में खाना बनाने की हो या फिर कोरे कागज़ों में रंग भरने की।

शीला शर्मा के बच्चों को भी है पेंटिंग का शौक

शीला शर्मा एक बहादुर महिला हैं और परिस्थितियों से किस तरह लड़ना है ये उन्हें बहुत अच्छे से आता है। अपनी इसी ज़िद के चलते शीला ने कभी किसी सरकारी अनुदान का सहारा नहीं लिया | शीला शर्मा के लिए अपंगता न तो कोई अभिशाप है और न ही ऐसी कोई कमी कि उसकी आड़ लेकर अपनी ज़रूरतों को आसानी से पूरा किया जा सके  शीला दो बच्चों की मां हैं। बच्चों को भी उनकी तरह पेंटिंग का शौक है | शीला अपने परिवार और काम में सामंजस्य बनाकर चलती हैं। उनके लिए उनकी कला पूजा है और परिवार उनकी ज़िंदगी। दोनों के बिना रह पाना मुश्किल है और साथ लेकर चलना आसाना |

कई बड़े शहरों में लगा चुकी है प्रदर्शनी

शीला कई शहरों में अपनी कला प्रदर्शनियां लगा चुकी हैं, जिनमें लखनऊ, दिल्ली, मुंबई और बैंगलोर जैसे महानगर भी शामिल हैं | शीला शर्मा  की अदम्य साहस और लगन का ही नतीजा है, कि वो अबतक अनेकों पुरस्कार अपने नाम की है | उनके जानने वाले उन्हें फुट पेंटर के नाम से पुकारते हैं | शीला को प्राकृति और औरतों की पेंटिंग बनाना अच्छा लगता है |

शीला शर्मा का मानना है, कि कोई भी कार्य असंभव नहीं है | हर काम किया जा सकता है, उसके लिए हाथ पैर और ताकत की जरूरत नहीं है बस दिमाग और सकारात्मक सोच का होना ज़रूरी है | शीला का सपना है कि वह ऐसे बच्चों की मदद करे जोकि अपंग हैं, और कुछ कर नहीं सकते | वह ऐसे बच्चों का सहारा देना चाहती है ताकि उनको सहास और उत्साह मिल सके और अपने दिमाग से वे अपंगता का विचार निकाल सकें | लेकिन यह काम  शीला शर्मा अपने दम पर करना चाहती है |

आंधियां भी आयीं थी तूफ़ान भी आये थे, मगर न जरा भी तुम्हारे कदम लडखडाये थे |
मिल रही है जो बधाई आज इतनी तादाद में, ये उसी का सिला है जो तुम वक़्त से टकराए थे |

niraj kumar

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
niraj kumar