पिछले कुछ वर्षो  से बिहार का नाम पढ़ाई से ज़्यादा टॉपर्स घोटाले की वजह से ज़्यादा याद किया जा रहा है | पर दोस्तों यह वही बिहार है जिसे IAS और IPS की फैक्ट्री कहा जाता था, पर अब फर्जी टॉपरों का उत्पादन कर रहा है | इन सब के बीच बिहार के गया में एक ऐसा भी गांव है, जहां टॉपर की कहानी तो नहीं, पर हां इंजीनियरों की कहानियां ज़रूर सुनाई जाती हैं | जिन्हें देश में बिहारी प्रतिभा को लेकर किसी भी तरह का शक है, उनके लिए ये गांव आईना की तरह है |

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बुनकरों का गाँव है ये

पटवा टोली (Patwa Toli) नाम का ये गांव नक्सल प्रभावित गया जिले में है | पटवा टोली गांव कभी बुनकरी के काम के लिए जाना जाता था | और काफी पिछड़ा हुआ था, पर पिछले 23 सालों से इस गांव के लड़के कुछ ऐसा कमाल कर रहे हैं, जो संभवत: देश के दूसरे गांवों में देखने को नहीं मिलेगा | बुनकरों के इस गांव से हर साल दर्जनों छात्र आईआईटी (IIT Student) और एनआईटी के लिए चुने जाते हैं | इतना ही नहीं दुनिया के 12 देशों में यहां के आईआईटी (IIT Student) पास आउट बढ़िया नौकरियों में हैं |

बिहार के गया जिले में है ये गाँव

गांव पटवा टोली (Patwa Toli) नाम का ये गांव नक्सल प्रभावित गया जिले में है| यहां के पटवा, बुनकरी का काम करते हैं। ये अन्य पिछड़ी जाति में आते हैं | पहली बार 1992 में इस गांव से एक छात्र जितेन्द्र ने आईआईटी (IIT Student) में दाखिला पाया था। ख़ास बात ये है कि आईआईटी में एडमिशन पाने वाले अधिकांश छात्रों के माता-पिता या तो कम पढ़े-लिखे हैं या पूरी तरह से निरक्षर हैं |

अधिकांश को आईआईटी का मतलब भी नहीं पता है।हालांकि, ये गांव भी बिहार (Bihar) के अन्य सामान्य गांवों की तरह ही है, लेकिन यहां से आईआईटी में चुने गए छात्रों (IIT Student) ने इसे एक अलग पहचान दे दी है | पिछले 23 सालों से यहां के छात्र आईआईटी के लिए चुने जा रहे हैं | गया का पटवाटोली गांव बुनकरों की आबादी के लिए जाना जाता है लेकिन यहां की 10 हज़ार की आबादी में से अब तक 300 छात्र गांव में पढ़ाई करके आईआईटी और एनआईटी जैसे इंजीनियरिंग संस्थानों में पहुंच चुके हैं |