अधिकतर युवाओं में खोज करने को लेकर आज भी बहुत कम अभिरुचि दिखती है | इसके दो मूल कारण हैं. पहला, खोज करने के लिए आधारभूत संरचना और पैसे का अभाव, और दूसरा  शोध में सफल होने में अधिक मेहनत और काफी समय का लगना | पूर्वी भारत खासकर झारखंड-बिहार में तो खोज करने को लेकर आधारभूत संरचना की हालत काफी खस्ती है, लेकिन इस हालात में भी झारखंड के सौरभ शांडिल्य जैसे युवा इस क्षेत्र में बेहतर काम कर रहे हैं | भौतिकी में उनके रिसर्च का क्षेत्र उच्च ऊर्जा भौतिकी है | फिलहाल अभी सौरभ शांडिल्य यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाटी, ओहायो, अमेरिका में पोस्ट डॉक्टोरल फेलो के रूप में कार्यरत हैं और इसी फेलोशिप के तहत सौरभ जापान में बेल्ल फर्स्ट तथा सेकेंड प्रयोग का हिस्सा हैं |

 

पढने में साधारण थे पर बीएचयू ने दी नयी उड़ान

देवघर जैसी छोटी जगह से निकल कर इतनी बड़ी सफलता बेशक बड़ी कामयाबी है | इन उपलब्धियों को जान कर मन में यह बात तैरने लगी कि बचपन से ही सौरभ शांडिल्य प्रतिभाशाली रहे होंगे और शिक्षा-दीक्षा अच्छे स्कूलों में हुई होगी, लेकिन एसी बात नहीं है सौरभ शांडिल्य स्कूल-कॉलेज में सामान्य छात्र थे | सौरभ शांडिल्य की  दसवीं की पढ़ाई मॉडर्न पब्लिक स्कूल, देवघर और इंटरमीडिएट देवघर कॉलेज से हुई | उसके बाद बीएससी (भौतिकी) व एमएससी की पढ़ाई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से हुई | स्कूल के दिनों से ही उन्हें विज्ञान अच्छा लगता था | इंटर में जाने तक उनकी रुचि खासकर भौतिकी में विकसित हुई | काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का भौतिकी विभाग काफी अच्छा था, जहां कुशल अध्यापक के साथ-साथ अच्छी प्रयोगशालाएं भी थीं | वहां जाने के बाद भौतिकी विषय उन्हें रोमांचित करने लगा और वहीं उन्होंने अपना लक्ष्य तय कर लिया था कि आगे विज्ञान के क्षेत्र में ही जाना है | इसके बाद चयन शोध के लिए उनका नामांकन टाटा फंडामेंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में हुआ, जो अपने देश का मूलभूत विज्ञान तथा गणित के लिए उत्कृष्ट शोध संस्थान है |

सौरभ शांडिल्य की खोज

अगर हम पदार्थ के सूक्ष्मतम स्तर तक जाएं, तो हम परमाणुओं से परिचित होते हैं | परमाणु के अंदर नाभिक होता है, जो प्रोटोन और न्यूट्रॉन कणों से बना होता है और इस नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाता है | इलेक्ट्रॉन प्रोटोन और न्यूट्रॉन क्वार्क नामक मूलभूत और अति सूक्ष्म कणों से बने होते हैं | उच्च ऊर्जा भौतिकी में मूलतः हम पदार्थों के इन्हीं मूलभूत तथा अति सूक्ष्म कणों और उनके बीच परस्पर क्रिया करनेवाले बलों का अध्ययन करते हैं | प्रत्येक पदार्थ कणों के प्रति पदार्थ कण होते हैं, जैसे इलेक्ट्रॉन का प्रति पदार्थ पॉजिट्रॉन, क्वार्क का प्रति क्वार्क इत्यादि | इन सभी प्रति पदार्थों की खोज प्रयोगशालाओं में की जा चुकी है. अगर अचानक पदार्थ कण अपने प्रति पदार्थ कणों से मिल जायें, तो आपस में विलीन हो जाते हैं और शेष सिर्फ ऊर्जा बचती है. तथाकथित बिग बैंग थ्योरी हमें बताती है कि ब्रह्मांड के निर्माण के समय बराबर मात्रा में पदार्थ और प्रति पदार्थ बने. अब प्रश्न यह उठता है कि क्या हम अपने आस-पास मुख्य रूप से पदार्थ कणों को पाते हैं? तो ये प्रति पदार्थ कण कहां गये? इसी मूल प्रश्न के उत्तर के लिए बेल्ल प्रयोग का निर्माण किया गया |

परिवार का मिला भरपूर सहयोग

सौरभ शांडिल्य के शोध को आगे बढ़ाने में उनके परिवार का बहुत बड़ा योगदान रहा है. पिता सेवानिवृत्त बैंकर, मां गृहिणी एवं बहन गणितज्ञ (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस टेक्नोलॉजी से डॉक्टरेट) हैं | जीवन संगिनी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में मिलीं, वो भी वैज्ञानिक हैं | वह स्टोनी ब्रूक यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क में कार्यरत हैं  | उनके परिवार के लोगों ने कभी कोई करियर (डॉक्टर या इंजीनियर) का लक्ष्य उन पर नहीं थोपा, बल्कि सहयोग ही किया | सौरभ मानते हैं कि शोध को आजीविका बनाना काफी कठिन होता है, क्योंकि आपको सफलता देर से मिलती है | लंबे संघर्ष में कई बार निराशा भी मिल सकती है | ऐसे में पारिवारिक सहयोग काफी महत्वपूर्ण होता है|

सौरभ शांडिल्य मानते हैं कि लक्ष्य निर्धारित करना अहम है | लक्ष्य ऐसा चुनें, जिसमें आपकी रुचि हो, जो सामाजिक या पारिवारिक दबाव से परे हो अन्यथा भटकाव की काफी संभावना रहेगी. जीवन में अनुशासन भी बेहद जरूरी है, हालांकि कहना जितना आसान है, वह व्यवहार में उतना ही कठिन है | अनुशासन और मेहनत का कोई तोड़ नहीं है | उन्होंने शुरू में ही अपना लक्ष्य तय कर लिया था और उससे ज्यादा वह भटके नहीं. कई बार निराश भी हुए, लेकिन इतना ज्यादा नहीं कि दिशा बदलनी पड़े | इस दौरान उतार-चढ़ाव को स्वीकार किया और पिछली गलतियों से सीख लेते हुए प्रयत्न किया कि दोबारा ऐसा न हो |

niraj kumar

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
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