हमारे समाज में सारे लोग सिर्फ अपने व अपने परिवार के लिए जीते हैं | पर समाज में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने परिवार के साथ दूसरों के सुख-दुख में भी अपना हाथ बंटाते हैं | तो आइये मिलवाते हैं दुसरे के दर्द को अपना बनाने वाली बिहार की इस दिव्यांग बेटी कुमारी वैष्णवी से जो बिहार के विक्रम प्रखंड के एक छोटे से गांव दतियाना की रहने वाली है | कुमारी वैष्णवी खुद दिव्यांग होते हुए अन्य दूसरे दिव्यांगों के अधिकारों के लिए लड़ती हैं | आज पीड़ित-शोषित दिव्यांग महिलाओं की आवाज बन चुकी हैं  कुमारी वैष्णवी |

विकलांग अधिकार मंच’ (Vikalang Adhikaar Manch) -दिव्यांगों (Disable People) -Kumari Vaishnavi -BiharStory is best online digital media platform for storytelling - Bihar | India

ट्यूमर के कारण खोना पड़ा पैर

बचपन से ही डांस का शौक रखनेवाली कुमारी वैष्णवी (Kumari Vaishnavi) गांव के ही प्रोग्रेसिव चिल्ड्रन एकेडमी में जब चौथी क्लास में थी तब स्कूल में हो रहे एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में डांस करते वक़्त अचानक से कांपने लगीं और फिर उन्हें बुखार चढ़ आया | जाँच कराने पर पता चला कि दोनों पैरों में ट्यूमर है | बाद में ऑपरेशन भी हुआ मगर कोई फायदा नहीं हुआ | ट्यूमर का असर पूरे शरीर में फैला और 1996  में न्यूरो फाइब्रो मेटॉसिस बीमारी की वजह से वे एक पैर से अपंग हो गयीं | कुमारी वैष्णवी (Kumari Vaishnavi) का काफी समय इलाज में हीं बीता | घरवाले उन्हें दिल्ली एम्स में ले गए जहाँ डॉक्टरों ने देखते ही हाथ खड़े कर लिए |

फिर उन्हें मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में ले जाया गया जहाँ एक साल तक वहीँ रहकर कीमियो थैरेपी हुई | डॉक्टरों ने कह दिया- ‘बहुत ज्यादा दिन जीने की उम्मीद नहीं है.’ फिर बैशाखी के सहारे चलनेवाली वैष्णवी (Kumari Vaishnavi) ने आगे की पढ़ाई घर पर रहकर पूरी की | किसी तरह 2004 में मैट्रिक की परीक्षा पास किया और अपने आगे की पढाई जारी रखी | 2007 में गंभीर रूप से बीमार पड़ने पर उन्हें पटना (Patna) के महावीर कैंसर संसथान में ले जाया गया जहाँ डॉक्टरों ने कह दिया – ‘ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ते की मेहमान हैं’ | लेकिन वैष्णवी (Kumari Vaishnavi) ने आत्मविश्वास नहीं खोया | उन्हें माँ दुर्गा में गहरी आस्था थी इसलिए तबसे ही वो घर में नियमित रूप से पूजा पाठ करने लगीं जिसकी वजह से उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से जीने की शक्ति मिलने लगी |

फिर मन की ताक़त से वो अपनी जानलेवा बीमारी को छकाती रहीं | डॉक्टरों के अनुसार उनकी वह बीमारी स्थिर तो हो गयी थी लेकिन खतरा पूरी तरह से टला नहीं था. उनका बाबा रामदेव से मिलना 2009 में हुआ. फिर उनके बताए योगासन और आयुर्वैदिक दवाइयों से बहुत सुधार होने लगा | अब वैष्णवी को मौत से बिल्कुल डर नहीं लगता | इसलिए वो कहती हैं कि ‘मैं जितने दिन ज़िंदा रही ज़िन्दगी को पूरी तरह से इंज्वाय करुँगी और समाज की पीड़ितों के दुःख-दर्द के लिए लगातार लड़ती रहूंगी.’

दूसरों के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दी

कुमारी वैष्णवी (Kumari Vaishnavi) आत्मनिर्भर होने के लिए व्यावसायिक पुनर्वास केंद्र से टेलरिंग में एक साल का प्रशिक्षण लेना शुरू किया | सरकार द्वारा दिव्यांगों को मिलनेवाली सुविधा एवं छूट हासिल करने के लिए जब कुमारी वैष्णवी प्रमाणपत्र बनवाने निकलीं और उसके लिए कुमारी वैष्णवी को जब दो सालों तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े तब एहसास हुआ कि उनके जैसे और भी दिव्यांगों को ना जाने कितनी तकलीफें झेलनी पड़ती होंगी |

‘विकलांग अधिकार मंच’ से जुड़ीं

कुमारी वैष्णवी (Kumari Vaishnavi) के मन में तभी से यह इच्छा जन्मी की अपने जैसे लोगों की भलाई के लिए उन्हें आगे आना पड़ेगा और इसी कड़ी में वे ‘विकलांग अधिकार मंच’ (Vikalang Adhikaar Manch) से जुड़ीं और फिर कुमारी वैष्णवी बिहार (Bihar) भर में घूम-घूमकर दिव्यांगों (Disable People) को संगठित करना शुरू कर दिया | उनके सराहनीय काम को देखकर ‘विकलांग अधिकार मंच’ (Vikalang Adhikaar Manch) का उन्हें राज्य स्तरीय अध्यक्ष बना दिया गया | इस संस्था के तहत वैष्णवी अपनी टीम के साथ दिव्यांगों (Disable People) का प्रमाण पत्र बनवाने से लेकर छात्रवृति दिलाने, अन्य सरकारी योजनाओं से जोड़ने आदि के कार्यों में लगी हुई हैं. कई दूर राज्यों से उन्हें सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया जाता रहा है जहाँ वे दिव्यांग (Disable People) लड़कियों को लीडरशिप की ट्रेनिंग देती हैं |

वैष्णवी को कई पुरस्कार और सम्मान भी मिले

कुमारी वैष्णवी (Kumari Vaishnavi) को 2008 में बिहार व्यावसायिक विकलांग (Disable People) पुनर्वास केंद्र के सौजन्य से जबलपुर में आयोजित ओलम्पिक में जहाँ 5 राज्यों के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था वहां हैण्ड निटिंग (बुनाई) में तृतीय स्थान प्राप्त कर कांस्य पदक जीता,फिर 2010  में गोल्ड मैडल जीता  उसके बाद उनका आत्मविश्वास इतना बढ़ा कि फिर कई जगहों पर आयोजित नृत्य, संगीत, हस्तकला आदि में ढ़ेरों पुरस्कार अपने नाम किये. | 2009 में सामाजिक संस्था ‘प्रयास’ की तरफ से उन्हें दिव्यांगों (Disable People) के लिए किये गए प्रशंसनीय कार्यों के लिए पुरस्कृत किया गया | 2012 में मुंबई की एक संस्था द्वारा आयोजित प्रोग्राम में उन्हें महाराष्ट्र के गवर्नर ने सम्मानित किया  2013 में उन्हें अहिल्या देवी महिला सशक्तिकरण अवार्ड दिया गया | 2013 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के हाथों बिहार (Bihar) महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) सम्मानित किया गया | 2014 में युवा रत्न अवार्ड दिया गया| इसके आलावा और भी कई संस्थाओं द्वारा उन्हें सम्मानित किया जा चुका है |

अनोखा विवाह’ के नाम से दिव्यांगों की सामूहिक शादियां करवायीं

कुमारी वैष्णवी (Kumari Vaishnavi) का सफ़र यही तक नहीं रुका ‘गांव में, परिवारों में दिव्यांगों (Disable People) की विवाह-शादी को लेकर कोई पहल नहीं करता, कोई उनकी भावनाओं को नहीं समझता, कोई ये नहीं समझ पाता कि उनके भी सपने हैं, वो किसी का बोझ ना बनकर आम लोगों की तरह खुद का घर बसाना चाहते हैं | तो यही सब सोचते-विचारते मन में यह बात आयी कि क्यों ना उनके इस सपने को पूरा कराया जाये | इसके लिए कुमारी वैष्णवी ने सरकार से बात की और 2016  में बिहार (Bihar) सरकार से प्रोत्साहन राशि पास करवाई | उसके बाद पहली बार विकलांग अधिकार मंच (Vikalang Adhikaar Manch) के तहत ‘अनोखा विवाह’ के नाम से दिव्यांगों (Disable People) की सामूहिक शादियां करवायीं जिनमे 7 जोड़े थें. इस आयोजन में बिहार (Bihar) के तत्कालीन राजपाल श्री रामनाथ कोविंद जी जो वर्तमान में देश के राष्ट्रपति हैं , ग्रामीण विकास कार्य मंत्री और केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद भी शामिल हुए | 2017 में हमने 9 दिव्यांग जोड़ों की शादियां करवायीं | इस आयोजन में स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया (State Bank Of India ) का बहुत ज्यादा सहयोग मिला | उनकी तरफ से हर जोड़े को सिलाई मशीन, बर्तन और आलमीरा देकर उनके घर बसाने के सपने को पूरा किया गया

लोग बोलते थे खुद का तो ठिकाना नहीं चली है दूसरों का भार उठाने

वैष्णवी जब घर से बाहर निकलकर दूर-दूर जाकर दूसरे दिव्यांग लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने लगीं तो ऐसे में उन्हें घरवालों का पूरा सपोर्ट मिला लेकिन पड़ोसी एवं रिश्तेदार ताना मारने लगें की खुद का तो ठिकाना नहीं चली है दूसरों का भार उठाने | लेकिन वैष्णवी ने कभी उनके तानों की परवाह नहीं की और सिर्फ अपने दिल की सुनी | आज वही ताना मारनेवाले लोग वैष्णवी के कार्यों की सराहना करते नहीं थकते.  वैष्णवी मानती हैं कि दिव्यांगों की आज गांव-घरवालों द्वारा कराई गयी 80 % शादियां सक्सेस नहीं हो पा रहीं. फिर बाद में उन्हें या तो छोड़ दिया जाता है या उनके रहते हुए दूसरी शादी कर ली जाती है जिससे उनकी ज़िन्दगी बद से बदतर हो जाती है | या फिर लोभ में की जा रही हैं | वैष्णवी चाहती हैं कि वे दिव्यांग लड़कियों को इतना सशक्त कर दें कि वे भविष्य में कभी कोई जुल्म ना सहें | अपने अधिकारों को समझें, उसके लिए खुद लड़ें | आज भी वे अकेली बाहर निकल पाएंगी कि नहीं ये उनका परिवार तय करता है, तो आगे से वे खुद निर्णय लेकर अकेले बहार निकले, पढ़े-लिखें और आत्मनिर्भर बनें, ताकि फिर कोई उन्हें बोझ और बेचारा समझने की गलती ना करे |