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किसी ने ठीक हीं कहा है की आप चाहे दुनिया के तमाम पकवान खाइये पर माँ के हांथो से बने खाने के आगे दुनिया के तमाम पकवान फीके हैं | मां के हाथ से बने खाने की खुशबू और प्यार की बात हीं निराली होती है, चाह कर भी कोई इन्सान मां के हाथ से बने खाने के स्वाद को भूल नहीं पाता है | आज की हमारी कहानी भी इसी बात से प्रेरित है |

माँ के प्यार (Maa Ka Pyaar) -Radhika Arora -Ambala -BiharStory is best online digital media platform for storytelling - Bihar | India

अंबाला (Ambala) की रहने वाली राधिका अरोड़ा (Radhika Arora) जिन्होने पहले एमबीए किया और उसके बाद कई कंपनियों में काम किया, लेकिन इस दौरान उनको सबसे ज्यादा जो कमी खली, वो थी मां के हाथ से बने खाने की। यही वजह है कि उन्होने अपनी जमी जमाई नौकरी को छोड़ चंडीगढ़ में खाने की एक ठेला लगाई, जहां पर राधिका अरोड़ा लोगों को घर जैसे स्वाद वाला खाना परोसती हैं | राधिका अरोड़ा (Radhika Arora) ने अपने इस ठेले का नाम भी रखा है ‘मां का प्यार’ जहां पर हर रोज सैकड़ों लोग उनके बनाये खाने का लुत्फ उठाते हैं |

माँ के हांथ के बने खाने में  हीं दिखा अपना कैरियर

राधिका अरोड़ा (Radhika Arora) ने जो किया वो कोई बड़ा जिगर वाला ही कर सकता है राधिका अरोड़ा ने अपनी स्कूली पढ़ाई मोहाली, चंडीगढ़ से की और उसके बाद चंडीगढ़  में ही रहकर एमबीए किया | उसके बाद 3 सालों तक उन्होने अलग अलग कंपनियों में काम किया | इस दौरान राधिका अरोड़ा हॉस्टल, पीजी और दूसरी जगहों में हीं रहती थी| इस दौरान राधिका अरोड़ा को खाने के लिए जो खाना उपलब्ध होता था वो उनको बिल्कुल भी पसंद नहीं आता था | राधिका अरोड़ा सोचती थी की हम कितने भी पैसा खर्च करे पर हमे घर वाला खाना नहीं मील सकता, इसलिए उनको हर पल अपने घर के खाने की याद आती | (Radhika Arora) चंडीगढ़ से हर हफ्ते अपने घर जाती थीं, लेकिन जब वो वापस चंडीगढ़ लौटती तो साथ में अपनी मां के हाथ से बने खाने का टिफिन भी लेकर आती थीं, ये देखकर उनके दोस्त उनसे कहते कि मां का प्यार आया है |

25 वर्षीय राधिका अरोड़ा जब रिलांयस जियो में काम कर रही थी तो उस दौरान उन्होने अपना खुद का कारोबार शुरू करने के बारे में सोचा। साथ ही तय किया वो खाने से जुड़ा कोई कारोबार हीं करेंगी इसके लिये उन्होने अपनी नौकरी भी छोड़ दी और मोहाली के इंडस्ट्रियल एरिया में खाने की एक ठेला लगाई और उसका नाम रखा ‘माँ का प्यार’ (Maa Ka Pyaar) इस नाम को रखने की प्रेरणा राधिका अरोड़ा को अपने दोस्तों से मिली, जो अक्सर उनके घर से लाये खाने के लिए मां का प्यार कहते थे |

घरवालों ने काफी विरोध किया

राधिका अरोड़ा के इस कदम से परिवार वालों का नाराज होना भी पारिवारिक दृष्टिकोण से सही था, क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि राधिका अपनी अच्छी खासी नौकरी को छोड़ सड़क किनारे ठेला लगाये | इसके अलावा घरवालों को ये चिंता लगी रहती थी की जब उसकी शादी हो जाएगी तब इस कारोबार को कौन देखेगा | पर कुछ हट कर सोंचने वाली राधिका अरोड़ा के मजबूत इरादों के आगे उनके पिता को भी झुकना पड़ा और आज वो भी राधिका अरोड़ा  के साथ मिलकर माँ के प्यार (Maa Ka Pyaar) को लोगों में बाँट रहे हैं

कुछ परेशानियां भी आई राधिका को

राधिका अरोड़ा जो मोहाली के इंडस्ट्रियल एरिया फेज आठ में ठेला लगती थी इस कारण उन्हें राधिका कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता था, बहुत बार नगर निगम राधिका अरोड़ा के उस ठेले को उठा कर ले जाते, इसके अलावा राधिका अरोड़ा द्वारा ठेला लगाने से दूसरे कैंटीन चलाने वालों का काम भी प्रभावित होता था | इस वजह से वो लोग भी राधिका अरोड़ा को बहुत तंग करते थे | फिलहाल राधिका अरोड़ा के पास इतने पैसे  नहीं है कि वो इस काम के लिए कोई जगह खरीद सकें, बावजूद मजबूत इरादों वाली राधिका इन सब परेशानियों से ऊपर उठकर अपने काम के विस्तार के बारे में सोचती रहती हैं | यही वजह है कि उन्होने मोहाली के बाद इस तरह की दूसरी ठेली चंडीगढ़ के आईटी पार्क में शुरू की है। राधिका हर रोज दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक अपनी ये ठेला लगाती हैं | अपने इस काम के लिए उन्होने एक कुक और 2 हेल्परों को रखा है | वो खुद कभी मोहाली में लगने वाली ठेली (Maa Ka Pyaar) में तो कभी चंडीगढ वाली ठेली में मौजूद रहती हैं | जबकि दोनों जगहों में लगने वाली ठेली के लिए उन्होने एक आदमी को खाना सर्व करने के लिए रखा है |

niraj kumar

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
niraj kumar
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