एक ग़रीब परिवार में जन्मे और सातवीं तक पढ़े, बाघ बहादुर को कमाने-खाने की चिंता पटना के चिड़ियाघर तक ले आई थी वह | 1972 का समय था, जब पटना के चिड़ियाघर की बाउंड्री का काम चल रहा था,और पटना के पास फुलवारी शरीफ़ के रानीपुर गांव में रहने वाले राम प्यारे को पता चला कि वहां मज़दूर की ज़रूरत है|

मात्र तीन रुपये की मज़दूरी पर राम प्यारे पटना जू में मज़दूरी करने लगे

जब बांउड्री का काम पूरा हुआ तो राम प्यारे (Bagah Bahadur, Ram Pyaare) वहां के पौधों की देखभाल करने लगे, उस वक़्त चिड़ियाघर में सिर्फ़ मोर और हिरण हीं थे | धीरे धीरे रामप्यारे जानवरों की देखभाल करने लगे, तो सरकारी नौकरी पर रख लिया गया और चिड़िया केज की जिम्मेदारी दी गई | 1984 में चिड़ियाघर के तत्कालीन निदेशक पीके सेन ने राम प्यारे (Ram Pyaare) को चिड़िया केज से हटाकर बाघों के पास लगा दिया और धीरे- धीरे उन्हें बाघों से लगाव हो गया | पर बाघों से राम प्यारे की ये दोस्ती कई बार उन्हें मौत के दरवाज़े तक ले आई थी | नवंबर 1991 में सोनू नाम के बाघ ने राम प्यारे पर (Ram Pyaare) जानलेवा हमला किया था, लेकिन उस हमले से भी उन्हें सोनी और रिंकी नाम की बाघिन ने ही बचाया था | सोनी बाघिन को ज़्यादा तवज्ज़ो देने से सोनू बाघ नाराज़ हो गया था | उसने नाराज़गी में छलांग लगाई और मेरे कंधों पर अपने पंजे रखकर अपना विशालकाय मुंह खोला ही था कि मुझे बचाने के लिए सोनी और रिंकी आ गए | उन दोनों को देखकर सोनू किनारे हो गया लेकिन बाद में वो मेरे पास आकर सर झुकाए देर तक खड़ा रहा और मैं उसे प्यार से सहलाता रहा |

राम प्यारे राम उर्फ़ 'बाघ बहादुर' (Baagh Bahadur, Ram Pyaare) -Patna Zoo -BiharStory is best online digital media platform for storytelling - Bihar | India

बाघिन रिंकी का राम प्यारे से लगाव की भी एक कहानी है

सफेद रंग की इस बाघिन को जब हार्निया हुआ, तो उसके लिए लेट पाना भी मुश्क़िल होता था इस दौरान 15 दिनों तक रामप्यारे (Bagah Bahadur, Ram Pyaare) ही रिंकी को हाथ में लेकर लेटे रहते थे | उस वक़्त तो घर भी बमुश्क़िल जाना होता था, घर जाता था, तो पत्नी कहती थी कि तुम्हारे शरीर से बाघ जैसी बदबू आती है |

बहुत  लोग चिड़ियाघर राम प्यारे को ही देखने आते थे

उनके मुताबिक़, “राम प्यारे करिश्मा से लगते थे और कई बार उनकी बाघ से नज़दीकी डराती थी, ऐसी फोटो तक को खींचने में डर लगता था, लेकिन राम प्यारे (Bagah Bahadur, Ram Pyaare) के चेहरे पर डर का कोई निशान नहीं होता था, बल्कि लगता था कि उसे सबसे ज्यादा सुकून बाघों के पास ही मिलता है | वैसे राम प्यारे इतने नाटे क़द के थे कि लगता है, एक स्वस्थ बाघ भी उनकी कमर से ऊंचा होगा | फिर बाघ बहादुर (Bagah Bahadur, Ram Pyaare) के इशारे पर बाघ कैसे नाचते होंगे? यह सवाल करने भर की देर थी और बहादुर ने पीले पड़ गए अख़बार की कतरनों का ढेर थमा दिया | उन कतरनों में छपी तस्वीरों में राम प्यारे राम उर्फ़ ‘बाघ बहादुर’, (Bagah Bahadur, Ram Pyaare) बाघ के मुंह से मुंह सटाए और उनके साथ सोए हुए दिखते हैं|

किसी फ़ोटो में बाघ के साथ उनका पूरा परिवार भी दिखता है

अब तो बाघ बहादुर (Bagah Bahadur, Ram Pyaare) पटना (Patna, Bihar)  के संजय गांधी जैविक उद्दान की पशुपालक की नौकरी से रिटायर हो चुके हैं बाघों के प्रति अपने लगाव की वजह से ही, वो बाघ बहादुर (Bagah Bahadur, Ram Pyaare) के नाम से लोकप्रिय हुए | पी के सेन के बाद आए निदेशक पीआर सिन्हा ने राम प्यारे को विदेशों में कई जगह बाघ और इंसान के दोस्ताना संबंधों के बारे में बताया |

उसके बाद तो बाघों के साथ राम प्यारे की दोस्ती कुछ यूं हुई कि उनके साथ सुबह की सैर, सोना और खेलना ही उनका जीवन बन गया था | जब कभी राम प्यारे बाघ से घायल हो जाते थे, तो वो देर रात घर जाते थे और अगली सुबह जल्दी निकल जाते थे | इस तरह से वो घर के लोगों से अपनी चोट को छुपा लेते थे और घर पर कोई झगड़ा नहीं होता था | अपने कार्य-काल के दौरान राम प्यारे राम जी ने इंसान से ज़्यादा, बाघों के पास वक़्त बिताया अब रियायर होन के बाद, क्या उन्हें बाघों की याद सताएगी?

niraj kumar

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एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
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