वैशाली की भूमि ने सदियों से ही संसार को कई वीर दिए थे फिर वह इस विकट घड़ी में कैसे पीछे रहती । सो इस घड़ी में इस भूमि ने अपने कई वीर सपूत दिए जिन्होंने भारत माता के नाम पर अपना सर्वस्व जैसे-घर परिवार, सुख चैन इत्यादि न्यौछावर कर तन मन एवं धन से देश को आजाद कराने में अहम भूमिका निभाई। इस प्रकार स्वतंत्रता के इस गंभीर संग्राम में वैशाली का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ऐसे ही एक वीर क्रांतिकारी थे-युगेश्वर प्रसाद ठाकुर ऊर्फ भुल्लर ठाकुर ।
स्वतंत्रता सेनानी (Freedom Fighter) -Yugeshwar Prasad Thakur -Vaishali, Hajipur -BiharStory is best online digital media platform for storytelling - Bihar | India
जन्मदिवस:-
 पुण्यतिथि:-3-जनवरी-1984ई

वैशाली के महान विभूति -युगेश्वर बाबू

 गणतंत्र की जननी वैशाली (Vaishali, Hajipur), विश्व की प्रथम गणतंत्र भूमि। अपने पावन भूमि पर भगवान बुद्ध, राजा विशाल, सम्राट अशोक, भगवान महावीर, आम्रपाली जैसे हस्तियों की उपस्थिति से ओतप्रोत होकर जब यह अपने सफलतम एवं गौरवशाली सफर में आगे बढ़ी तो एक दो सौ वर्षों का दुर्गम पड़ाव आया जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है। इस पड़ाव से चलने के बाद दो सौ वर्षों का मार्ग अत्यंत दुर्गम था लेकिन, वैशाली की धरा ने सदैव ही कठिनाइयों का सामना बड़े ही धीरज से किया था । इस धरती ने सदैव ही भारतवर्ष के इतिहास को गौरान्वित किया ।
वैशाली (Vaishali, Hajipur) की इस पावन धरती ने ललितेश्वर प्रसाद शाही, गुलजार पटेल, रामचंद्र सम्राज, हरिहर सिंह, चतुर्भुज सिंह, सुदर्शन सिंह, अक्षयवट राय, बसावन सिंह और न जाने ऐसे कितने वीर सपूतों को अवतरित किया जिन्होंने पूरी सहभागिता से स्वतंत्रता आंदोलन में वैशाली की मिट्टी की सोंधी खुशबू बिखेर दी ।
ऐसे ही वीर सपूतों में एक नाम युगेश्वर प्रसाद ठाकुर (Yugeshwar Prasad Thakur) ऊर्फ भुल्लर ठाकुर (Bhullar Thakur) का भी है जिन्होंने भारतीय स्वाधीनता के लिए अपने घर परिवार ,मां बाप और भाई बहन तक की परवाह नहीं की और भारत मां की आजादी के लिए जान की बाजी लगा दी। देश के लिए जीने और मरने वाले युगेश्वर प्रसाद ठाकुर (Yugeshwar Prasad Thakur) ऊर्फ भुल्लर ठाकुर (Bhullar Thakur) ने भी वो सारे कर्तव्य निभाए जो एक क्रन्तिकारी (Freedom Fighter) अपनी भारत माता की अखंडता और संप्रभुता और स्वतंत्रता कायम रखने के लिए निभाता है |
युगेश्वर प्रसाद ठाकुर (Yugeshwar Prasad Thakur) ऊर्फ भुल्लर ठाकुर (Bhullar Thakur) का जन्म 25-जून-1900ई में  बेलसर प्रखंड के एक छोटे से गांव मानपुरा में हुआ था। चूंकि जब श्री ठाकुर का जन्म हुआ था तब जमाना खास तौर पर गांवों की हालत काफी पिछड़ी हुई थी और उस वक्त के कई महत्वपूर्ण सेनानियों को देश याद ना रख सका उसी मे एक थे भुल्लर बाबू। वे बचपन से ही स्वछंद प्रवृत्ति एवं उन्मुक्त विचारों के थे। बचपन से ही वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे साथ ही वे त्याग, दया एवं करूणा की प्रतिमूर्ति थे ।

महज 17 वर्ष की उम्र में बने क्रन्तिकारी

कभी भगवान महावीर की जन्मधरा, भगवान बुद्ध की कर्मभूमि और कभी राजा विशाल और सम्राट अशोक के सुशासन एवं प्रताप से लहलहायी वैशाली की  धरती ने जब  भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के पथ पर कदम रखा तो उस समय वैशाली  सहित पूरा भारत गरीबी और भूखमरी के चपेट मे था और जमींदारी प्रथा अपने चरम पर थी ।
युगेश्वर बाबू बचपन के दिनों से ही लोगों की समस्याओं को देखकर दुखी होते और हमेशा उनके निवारण की बात सोचते रहते। दिन बीते भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की रुप रेखा तैयार हुई। गांधी जी से प्रेरित होकर जब युगेश्वर बाबू स्वाधीनता संग्राम में कूदे तब उनकी उम्र मात्र 17 वर्ष की थी। वर्ष 1917 युगेश्वर बाबू के संग्राम में आगमन का गवाह बनी । अपने कई साथियों एवं सहयोगियों के साथ मिलकर उन्होंने कई आंदोलन किए । 1917-1921 तक गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने असहयोग आंदोलन, हरिजन आंदोलन, जमींदारी उन्मूलन आंदोलन जैसे कई आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं। सबकुछ चलता रहा ।दिन बीतते रहे।
1942 में गांधी जी के नारे “अंग्रेजों भारत छोड़ो”ने इनके खून में उबाल ला दिया। मानो इनमें नई जान फूंक दी गई हो।युगेश्वर बाबू दलबल के साथ अंग्रेजों को भारत छुड़ाने में जुट गए।आंदोलन के दमन के लिए अंग्रेजी पुलिस ने इन्हें इनके साथियों सहित गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।जेल में इनलोगों को असहनीय यातनाएं एवं पीड़ाएं दी गईं लेकिन इन वीर सपूतों ने उफ तक न किया क्योंकि इनलोगों ने देशप्रेम में जीवन का मोह बहुत पहले ही त्याग दिया।उन्हें देशप्रेम के आगे अपनी जान तक की परवाह नहीं थी ।जेल में उन्होंने एक लम्बी और कष्टकारी अवधि व्यतीत की ।भारत की आजादी के बाद वे जेल से बाहर आए और अपने गांव में रहकर अनवरत गरीबों, असहायों एवं जरुरतमंदों की सेवा करने की ठानी और आजीवन करते भी रहे।वर्ष 1971 में सरकार ने स्वतंत्रता सेनानी पेंशन योजना के तहत उन्हें पेंशन देना शुरू किया।पेंशन की राशि को भी वे सामाजिक उत्थान में खर्च कर दिया करते थे क्योंकि देशप्रेम उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका था। 03 जनवरी 1984 को युगेश्वर बाबू का निधन हो गया।पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।सभी गमगीन हो गए।सभी ने भारी मन और नम आंखों से अपने मसीहा को विदाई दी ।उनके निधन को स्थानीय बुद्धीजीवियों ने अपूरणीय क्षति.बताया जो कि एक अटल सत्य है| युगेश्वर बाबू पूरे समाज खासकर गरीबों, मजबूरों,लाचारों,किसानों इत्यादि की आशा और विश्वास थे।गरीब और असहाय उन्हें अपना भगवान मानते थे।
          धीरे-धीरे वक्त बीते, नई पीढ़ियां आई और युगेश्वर बाबू के देश और समाज के प्रति किए गए कार्यों को भूलने लगी तब उनके प्रपौत्र  अमित कुमार एवं युवा संघर्षशील कवि साहित्यकार विक्रम कुमार ने मिलकर”स्वतंत्रता सेनानी भुल्लर ठाकुर स्मृति फाऊंडेशन”के नाम से एक संस्था बनाई । इस संस्था ने पटेढ़ी बेलसर क्षेत्र के कई स्थानों पर  उनके पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी पावन स्मृति में पटेढ़ी बेलसर क्षेत्र के मनोरा राम जानकी मठ,श्री दुर्गा मंदिर सहित कई लोगों के दरवाजे पर  पौधारोपण कर लोगों को उनके जीवन तथा उनके द्वारा किए गए कार्यों को बताया ,ताकि लोग अपनी माटी में जन्मे महान विभूति को जानें और युगों तक याद रखें।  फाऊंडेशन के अध्यक्ष विक्रम कुमार के नेतृत्व में एक नि:शुल्क शिक्षण संस्थान”गुरुकुल”मनोरा की नींव रखी गई और उसमें प्रतिदिन छह घंटे की निशुल्क शिक्षा गरीब बच्चों को दिया जाना सुनिश्चित किया गया। उनके पुण्यतिथि की पूर्व संध्या एवं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजली सभा का आयोजन किया जिसमें स्थानीय ग्रामीणों, बुद्धिजीवियों एवं छात्र छात्राओं ने मोमबत्ती जलाकर तथा उनके तैलचित्र पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी।तथा फाउंडेशन के सदस्यों ने संकल्प किया कि आगामी दिनों मे सभी सदस्य मिलकर 1000 पौधा अपने अपने स्तर से सभी इलाकों मे लगाया जायेगा। वहां उपस्थित सभी ने एक स्वर में कहा कि जब तक दुनिया है हम युगेश्वर बाबू के कार्यों को नहीं भूलेंगे।