आधुनिकता के इस दौर में भी हमारे समाज में कुष्ट रोगियों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है,मानो उसके माथे पर लिख दिया गया हो की वो कलंकित है | पर मित्रों वो भी इन्सान हैं और उन्हें भी समाज में सर उठा कर जीने का हक़ है | अगर उन्हें सही दिशा दी जाये तो वो भी अपनी जिंदगी बेहतर ढंग से जी पाएंगे | कुछ एसा ही प्रयास कर रहे हैं उत्तरप्रदेश (Uttarpradesh) के हमीदपुर जिले के निवादा गाँव के रहने वाले आशीष गौतम (Aashish Gautam), जो अपने कुछ नौजवान कर्मठ सहयोगियों के साथ रा कुष्ठ रोगियों व उनके बच्चों के बीच स्वास्थ्य, शिक्षा-संस्कार, स्वावलम्बन के कार्यक्रमों से उन्हें नवजीवन प्रदान कर उनमें जीवन के प्रति आशा व उल्लास का संचार तो कर ही रहे हैं, साथ ही वे तथाकथित सभ्य समाज में ई संवेदना को भी जगाने के प्रयास में निरंतर जुटे हैं |

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक भी थे ‘आशीष गौतम’

22 अक्टूबर, 1962 को जन्मे श्री आशीष गौतम (Aashish Gautam) का बचपन से ही आध्यात्म की तरफ झुकाव था | इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए., एल.एल.बी. करने के बाद आशीष गौतम’ (Aashish Gautam) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने | 1988 से 1995 तक प्रचारक रहने के बाद भगवान में इनका मन होने के कारण वे हिमालय क्षेत्र में घुमने के लिए निकल गए। शुरुआत में ये हरिद्वार में रहें, जब एक दिन आशीष गौतम (Aashish Gautam) चंडीघाट के पुल पर खड़े थे, वहां इन्होनें काफी संख्या में कुष्ठ रोगी देखे, जो अपनी मौत का इंतज़ार कर रहे थे | आशीष गौतम (Aashish Gautam) भी कोई सामान्य व्यक्ति की तरह  दृश्य को देखकर आगे बढ़ सकते थे, पर उन्होंने एसा नहीं किया | उसी वक्त आशीष गौतम ने ठान लिया की इन कुष्ठ रोगियों के किये कुछ बेहतर किया जाये | आशीष गौतम का इन लोगों की सेवा करने का जो इनका फैसला था, वो आशीष गौतम जी जैसा एक व्यक्ति ही ले सकता था, क्योंकी तब इनपर इन लोगों की सेवा करने के लिए ना तो धन था, ना ही कोई जमीन, जहाँ ये अपना कैंप बना सकते हों पर इन्होनें हार नही मानी | इन्होनें ये तय कर लिया था, कि अब अगर जीना है, तो इन्हीं की खातिर जीना है |

कुछ इस तरह शुरू हुआ ‘दिव्य प्रेम सेवा मिशन’

आशीष गौतम (Aashish Gautam) अपना सेवा कार्य (Social Work) एक झोपड़ी बनाकर शुरू किया, दवा का इंतजाम आस-पास से ही किया गया,धीरे-धीरे कुष्ठ रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही थी सो आशीष गौतम (Aashish Gautam) ने  12 जनवरी, 1997 को दिव्य प्रेम सेवा मिशन की नीव डाली | दिव्य प्रेम सेवा मिशन (Divy Prem Sewa Mission) में क़रीब 80 परिवार रहते हैं, और इन परिवारों में बच्चे और बड़े समेत लगभग 210 सदस्य हैं |

बिना किसी सरकारी मदद के करते हैं सेवा

इन कुष्ट रोगियों को समाज में क्या कुछ झेलना पड़ता था, अगर आपको जानना है तो  कुछ कुष्ठ रोगियों से आप यदि बात करना चाहते हैं, तो आपको दिल का इतना मजबूत होना चाहिए कि आप इनके आसूंओं को अपने हाथों से साफ़ कर सकें | ये लोग बोलते हैं कि उन्हें समाज में से बाहर निकाल कर फेंक दिया जाता है। इसके बाद वह बतातें हैं कि कुछ सरकारी सहायता तो ज़रूर मिलती है, लेकिन वह परिवार के भरण-पोषण के लिए नाकाफी है | कुष्ठ रोग होते ही घर से इन लोगों को निकाल दिया जाता है, यहाँ तक कि महिलाओं के साथ भी ऐसा ही किया जाता है | ऐसे ही लोगों को जगह देता है, दिव्य प्रेम सेवा मिशन (Divy Prem Sewa Mission). मिशन को किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता प्राप्त नहीं हुई, ये सारा कार्य आशीष जी और उनके साथियों ने किया है, जो हर पल मानव की सेवा करने में लगे हुए हैं |

सेवा के अलावा स्वरोजगार के गुण भी सिखाती है

जब दिव्य प्रेम सेवा (Divy Prem Sewa Mission) इन लोगों की सेवा कर रहा था, तब ये देखा गया कि कुष्ठ रोगियों के बच्चे, हरिद्वार में भीख मांगते हैं, और यहाँ अनाथ बच्चों की संख्या भी काफी बढ़ चुकी है | तब मार्च, 1998 में कुष्ठ रोगियों के 15 बच्चों को लेकर चंडीघाट में ‘सेवा कुंज’ के नाम से एक छात्रावास प्रारंभ किया गया | सन् 2002 में मिशन ने हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर 15 बीघे जमीन खरीदी और वहां वंदे मातरम् कुंज के नाम से एक विधिवत छात्रावास प्रारंभ किया | कुष्ठ रोगियों और आस-पास की उपेक्षित बस्तियों के बच्चों के लिए ‘माधव राव देवले शिक्षा मंदिर’ (Madhav Rao Devle Shiksha Mandir) नामक विद्यालय चलाया जा रहा है |

इसके अलावा यहाँ अब महिलाओं के लिए लघु एवं कुटीर उद्योग की भी शुरुआत कर दी गयी है. जहाँ कढ़ाई, स्क्रीन प्रिंटिंग, अगरबत्ती बनाना, गुलाब की खेती आदि का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
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