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हमारे समाज में ऐसी बहुत सी समस्याएं आप को देखने को मिल जाएगी जिसे देख कर आप खुद को असहज महसूस करेंगे  और सोंचेगे की समाज की इन समस्याओं का निदान करने का जिम्मा सरकार पर होता है | पर  दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो समाज मे रहकर इन सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए आगे भी बढते है और अपने जीवन को समाज के कार्यो में लगाते हैं | जी हाँ हम बात कर रहे है आगरा के लखन कुमार की जोकि उम्र में तो 25 साल के है पर उनके सामजिक कार्य उनके उम्र के मोहताज नहीं है। लखन कुमार ने खुद शिक्षा पाने के लिए बहुत दिक्कतों को सामना किया तो गरीब बच्चों को शिक्षा देने का काम शुरू करने के लिए जॉब छोड़ दी और शुरू का दी एक मुहीम |

काफी तंग हालात में अपनी पढाई पूरी किये थे लखन कुमार

एक गरीब परिवार में जन्मे लखन कुमार के पिता पिता बिजेंद्र सिंह जूते कार्य से जुड़े हुए थे | परिवार के हालत ऐसे थे कि प्रारंभिक शिक्षा सरकारी स्कूल से ली और अब बी टेक कर लिए | बी टेक करने के बाद लखन कुमार औरंगाबाद महाराष्ट्र में जॉब करने चले गए, पर लखन कुमार औरंगाबाद में गरीब बच्चों को सड़को पर ऐसे ही घूमते देखते थे तो बहुत बुरा लगता था | फिर लखन कुमार के मन मे ख्याल आया कि इन गरीब बच्चों के लिए कुछ किया जाये और फिर नौकरी छोड़ कर वापस आगरा आ गए और फिर लग गए गरीब बच्चों की जिंदगी सँवारने  |

एन.जी.ओ ( आधी आबादी ) की नीव डाली

लखन कुमार अपने परिवार में बहुत दिक्कते झेली थी, उन्हें अपनी पढ़ाई करने के लिए काफी जदोजहद करनी पड़ी थी, तो लखन कुमार ने मन सोचा कि जो गरीब परिवार के बच्चे है और आर्थिक स्थिति न होने की बजह से पढ़ाई नहीं कर पाते है उनके लिए कुछ किया जाए तो इस मकसद को पूरा करने के लिए अपने कुछ साथियों के साथ एनजीओ ( आधी आबादी ) बनाया और उसके माध्यम से अक्षर पाठशाला की शुरुआत की | पाठशाला रामबाग क्षेत्र के नगला रामबल में शुरू की, क्योंकि यहां पाठशाला शुरू करने की एक वजह ये थी कि लखन कुमार  ने यहां शुरू से देखा था कि दलित वर्ग के बच्चे जिनके परिवार के लोगों की इतनी क्षमता नहीं थी कि वो बच्चों को अच्छे स्कुल में पड़ा सके | हमने पाठशाला शुरू कर तो दी पर बच्चों बहुत कम ही पाठशाला में आते थे….बच्चों की संख्या बढाने के लिए बच्चों के परिजनों को घर घर जा कर समझाना शुरू कर दिया। ये बात लोगों को समझ आई और फिर इस बात के परिणाम भी आने लगे और धीरे स्कूल में 250 बच्चों की संख्या हो गई |

एक पुराने खंडहर को स्कूल में परिवर्तित किया

लखन ने बताया कि सबसे बडी दिक्कत ये थी कि स्कूल शुरू करने के लिए एक जगह की आवश्यकता थी तो हमने क्षेत्र में खंडर नुमा जगह देखी तो सोचा यही से स्कूल की शुरूआत की जाए तो अपने साथियों के साथ उस खंडर को स्कूल खोलने लायक बनाने की पहल शुरू की और साथियों के साथ साफ सफाई कर उस जगह को स्कूल चलाने लायक बनाया |

लड़कों की पढाई को दिलचस्प बनाने के लिए करते हैं कुछ अलग

अब लखन कुमार के सामने समस्या ये थी कि स्कूल को चलने के लिए आर्थिक जरूर भी क्योंकि उन बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने के लिए किताबे व कुछ ऐसा दिया जाए जिसके लिए बच्चे रोज़ स्कूल में आये तो लखन कुमार ने  तय किया कि बच्चों को हर दिन खाने में ऐसा कुछ दिया जाए ताकि बच्चो का मन स्कूल में आने को बना रहे | तो पढ़ाई के लिए किताबों की और हर दिन खाने के समान के लिए पैसे की भी जरूरत पड़ती थी, तो जितना भी हम आर्थिक तौर से सहयोग करते थे वो कम पड़ता था तो आर्थिक रूप से मजबूत होने के लिए लखन कुमार समाज के उन लोगो से मिलना शुरू किया जो हमको स्कूल चलाने के लिए आर्थिक सहयोग करे धीरे धीरे ऐसे लोग भी हमसे जुड़ने लगे और मद्दत होने लगी और बच्चों को पढ़ाने के लिए शुरू की गई मुहिम भी रंग लाने लगी। इसके अलावा लखन कुमार अनाथालय में समय समय पर छोटे बच्चो के लिए कपडे और खाने पीने का सामान पहुंचाते रहते हैं |

वैसे तो समाज के इस वर्ग की जिम्मेदारी सरकार की है की उनको अच्छी शिक्षा और रोजगार मिल सके | कही न कही समाज एक वर्ग ऐसा भी है जो इसे लोगों की मदत के लिए तत्पर रहता है तो मेरा सभी से अनुरोध है की अगर आप खुद अधिक समय न दे पाए तो एनजीओ से जुड़ कर आर्थिक रूप से मदद करें | ताकि गरीब लोगों और उनके बच्चों का ज्यदा से ज्यदा सहयोग हो सके |

niraj kumar

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
niraj kumar
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