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जो मायूस चेहरे पर  मुस्कान लाने का काम करते है  या  जो किसी असहाय और मजबूर की  मदद करते हैं वह इंसान आज की तारीख में  किसी फ़रिश्ते से कम नहीं और इसका जीता-जागता उदाहरण हैं संस्कृति फाउंडेशन की सचिव  आकांक्षा भटनागर , जो हर उस इन्सान के चेहरे पर हँसी और जीवन में ख़ुशी लाने के लिए प्रयासरत रहती है जो किसी भी कारण से तकलीफ में हो | शायद इसी लिए भगवान भी उनके चेहरे से कभी हँसी और जीवन से ख़ुशी कम नहीं होने देता |

akanksha bhatnagar

 

बचपन से रही समाजसेवा करने की ललक

वैसे तो आकांक्षा भटनागर मूल रूप से उत्तरप्रदेश की रहने वाली है पर उनके पिताजी बिहार में सरकारी नौकरी करते थे , इस कारण सपरिवार बिहार की राजधानी पटना में रहने लगी | अपने पिताजी को आदर्श मानने वाली आकांक्षा भटनागर बचपन से हीं किसी अनजान व्यक्ति को बिना किसी हिचकिचाहट के मदद करती थी | आलम ये था कि  अगर वो किसी रिक्शा से अपने घर आती थी तो आने से पहले हीं आकांक्षा अपनी माता जी को फोन कर के बता देती थी आप पानी तथा कुछ खाने का सामान तैयार कर दे रिक्शे वाले भैया के लिए |

आकांक्षा भटनागर की यही सोच है कि “जो अपने लिए जीते है वो मर जाते है, जो समाज के लिए जीते है वो तो मरकर भी हमेशा के लिए जिंदा रहते है””

सेवा के लिए संस्कृति फाउन्डेशन की नीवं डाली

आकांक्षा भटनागर जब अपनी पढाई पूरी की तब उन्होंने समाज समाज में व्याप्त समस्याओं को देखते हुए सोंचा की इन समस्याओं से अकेले निपट पाना टेढ़ी खीर है तब उन्होंने संस्कृति फाउन्डेशन की नीवं डाली जिसके अंतर्गत रक्तदान शिविर का आयोजन करवाना, किसी गरीब के इलाज के लिए जरुरी मदद पहुँचाना ,गरीब बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था करवाना,गरीब महिलाओं के बीच जा कर सैनिटरी पैड या उन्हें नए वस्त्र देना तथा स्लम बस्तियों में जा कर खाना वितरण करना जैसे सराहनीय कार्यो को उनकी संस्था बखूबी अंजाम देती है |

खुद के पैसे या अपनी माँ के पेंशन के पैसे से करती हैं मदद

आकांक्षा भटनागर समाज के लिए जो कुछ भी करती है वो अपने द्वारा कमाए पैसे से करती है अगर वो पैसे भी कम पड़ जाये तब अपने माता जी के पेंशन के पैसे भी खर्च कर डालती है  और उनकी माता जी भी बिना किसी संकोच के अपनी पेंशन के सारे-के-सारे पैसे आकांक्षा भटनागर के हांथो में दे देती है क्योंकी उनकी माता जी  भली-भांति जानती हैं कि  आकांक्षा वो पैसे किसी नेक कार्य के लिए हीं ले रही है |

बच्चियों को गुड-टच और बैड-टच से भी अवगत कराती हैं

आज हमारे समाज में बच्चियां कितनी सुरक्षित है ये बात हम भली-भांति जानते हैं आये दिन मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं होती रहती है इसी को ध्यान में रख कर स्लम बस्तियों में जा कर वहां के बच्चियों को गुड-टच बैड-टच से अवगत करवाने के लिए ट्रेनिंग देती हैं ताकि वो भविष्य में बलात्कार की शिकार न बने | कुछ दिन पहले की हीं बात है बलात्कार की शिकार बच्चियों के दोषी को फांसी की सजा दिलाने के लिए आकांक्षा भटनागर गाँधी मैदान पटना में 72 घंटे उपवास पर बैठी थी ताकि उन मासूमों को न्याय मिल सके |

‘स्वच्छ तन-स्वच्छ मन’ के लिए चलाया अभियान

“सोच बदलो , समाज बदलेगा ” इस नारा को लेकर समाज में माहवारी और सेनेटरी पैड को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने और हर महिला तक सेनेटरी पैड को पहुँचाने का बीड़ा भी आकांक्षा ने उठाया है, पटना की ‘पैड गर्ल’ बनकर आकांक्षा भटनागर ने महिलाओं व लड़कियों के स्वास्थ्य को लेकर सेनेटरी पैड के इस्तेमाल और इसे लेकर घर में छुआछूत के नाम पर लड़कियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार और भेदभाव के विरुद्ध चलाये जा रहे अभियान से सम्बंधित ‘स्वच्छ तन-स्वच्छ मन’ कार्यक्रम की शुरुवात की और महिला समाज को इस अभियान से जोड़ रही है |

niraj kumar

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
niraj kumar
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