कौन कहता है कि सफलता सिर्फ उन्हीं के कदम चुमती है जो शारीरिक रुप से मजबूत व स्वस्थ होते हैं? सच तो यह है कि सफलता उस वृक्ष के समान है जिसे वर्षों तक मेहनत और परिश्रम के पानी से पालना पड़ता है, सालों की उस तपस्या के बाद ही उस वृक्ष के फलों का आनंद मिलता है | मतलब ये कहना गलत नहीं होगा कि सफलता सिर्फ वही पा सकते हैं जिनके मन में उसे पाने की सच्ची चाह, जज्बा और लगन होती है | इस कथन को साबित कर दिखाई है गाजीपुर जिले की रहने वाली सविता सिंह (Savita Singh)| राजस्व विभाग में लेखाधिकारी के पद पर काम करने वाली सविता सिंह (Savita Singh) आज दो सौ दिव्यांग बच्चों (Handicapped Children) के लिए मां की तरह हैं |

Handicapped Children Life saving Savita Singh

कोशिश दिव्यांग बच्चों (Handicapped Children) को मुख्यधारा में लाने की

समाज में कई ऐसे लोग हैं जो दिव्यांगों (Handicapped Children) को मुख्यधारा में लाने की कोशिश में लगे हैं | ऐसी ही हैं गाजीपुर जिले की रहने वाली सविता सिंह राजस्व विभाग में लेखाधिकारी के पद पर काम करने वाली सविता सिंह आज दो सौ दिव्यांग बच्चों के लिए मां की तरह हैं |

सविता सिंह खुद भी दिव्यांग हैं

सविता सिंह का एक पैर बचपन से ही खराब है, लिहाजा सविता आम बच्चों की तरह न दौड़ पाती थी और न ही डांस कर पाती थी, लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा वाकया हुआ जिसने सविता के जीने का नजरिया ही बदल दिया | सविता सिंह ने इन बच्चों को जन्म तो नहीं दिया, लेकिन जन्म देने वाली से कहीं बढ़कर हैं | उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इन दिव्यांग बच्चों के लिए समर्पित करने का फैसला कर लिया है, अब ये बच्चे ही सविता की जिंदगी हैं | सविता जीती हैं तो बस इन बच्चों के लिए |

सविता ने कैसे संवारी दिव्यांगों की दुनिया

गाजीपुर के शास्त्री नगर इलाके में सविता सिंह इन दिव्यांग बच्चों के लिए एक स्कुल चला रही है ताकि ये बच्चे इस काबिल बन जाये की उनको किसी दुसरे के सहारे की जरुरत न पड़े | सविता के स्कूल में इस वक्त दो सौ के ऊपर बच्चें हैं, जो हर रोज पढ़ाई के लिए उनके स्कूल में आते हैं | बच्चों की पढ़ाई के साथ साथ सविता उन्हें रोजगार देने वाले कोर्स की ट्रेनिंग भी दिलाती हैं, ताकि पढ़ाई के बाद ये बच्चें खुद का रोजगार कर सकें | सविता के स्कूल में कंप्यूटर के साथ सिलाई कढ़ाई की ट्रेनिंग दी जाती है | सविता जानती हैं कि अगर इन बच्चों को मानसिक रुप से मजबूत बनाना है तो इन्हें शिक्षित करना बेहद जरुरी है, लिहाजा एक स्कूल की जरुरत थी जहां ये बच्चें पढ़ाई कर सकें | लेकिन दुर्भाग्यवश पूर्वांचल के पिछड़े जिलों में शुमार गाजीपुर में दिव्यांगों के लिए कोई भी स्कूल नहीं था |

तब आया स्कुल खोलने का विचार

दिव्यांग बच्चों की इसी जरुरत को सविता ने समझा और एक स्कूल खोलने का निर्णय किया | हालांकि ये इतना आसान नहीं था, पर सविता ने भी हार नहीं मानी | दिव्यांग बच्चों के लिए सविता मुहल्ले मुहल्ले चक्कर लगाती रहीं, लोगों से चंदा मांगा कुछ ने आगे बढ़कर उनका साथ दिया तो कुछ ने दिव्यांगों का नाम सुनते ही मुंह फेर लिया | दिव्यांगों का स्कूल खोलने के लिए सविता ने अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई लगा दी | सालों की मेहनत के बाद आज शास्त्रीनगर मोहल्ले में बच्चों का स्कूल बन पाया | इस स्कूल में बच्चों के रहने के हॉस्टल की भी व्यवस्था है | आज सविता इन बच्चों के साथ बेहद खुश हैं…..

niraj kumar

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