भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा बनने का सपना संजोये हजारों खिलाड़ी रोजाना आते हैं, और इन्ही खिलाड़ियों में से कोई अपने प्रतिभा के बल पर क्रिकेट की दुनिया में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो जाते हैं | और आज हम जिस नौजवान खिलाड़ी की बात कर रहे हैं वो हैं पृथ्वी शॉ जिन्होंने अपने करियर के पदार्पण मैच में हीं शानदार शतक लगाकर सबको चौंका दिया | क्रिकेट जगत के कई दिग्गजों ने भी पृथ्वी शॉ की तारीफ की है |

बिहारी बाबु हैं पृथ्वी शॉ

इस बीच हम आपको बता दें कि देश में कई क्रिकेट फैन पृथ्वी शॉ को मुंबई का रहने वाला मानते हैं लेकिन बहुत कम लोग यह बात जानते हैं कि पृथ्वी शॉ बिहार के लाल हैं, उनका परिवार आज भी  बिहार में रहता है | पृथ्वी के पिता पंकज शॉ बिहार के गया जिले में मानपुर गांव के रहने वाले हैं | पृथ्वी का जन्म मुंबई के विरार इलाके में 9 नवंबर 1999 को हुआ था | पंकज शॉ पृथ्वी के जन्म से पहले मुंबई आ गए थे ऐसे में भले ही पृथ्वी मुंबई में बड़े हुए हैं लेकिन बिहार से उनके संबंध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पृथ्वी शॉ के दादा अशोक साव और दादी रामदुलारी अब भी बिहार के मानपुर में रहते हैं |

पर सफ़र आसान न था

सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ जैसे दिग्गज बल्लेबाज इस युवा के कायल हो गए। मगर मुंबई के बल्लेबाज के लिए टीम इंडिया तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। उन्होंने कई समझौते किए और परेशानियों का सामना किया, जिसमे बाद उन्हें भारतीय टीम की कैप पहनने का मौका मिला।

बेटे के सपने के लिए पिता ने बेच दी अपनी दुकान

पृथ्वी के पिता ने कपड़ो की दुकान खोली थी, जो सूरत और बड़ौदा तक लोकप्रिय भी हो चुकी थी | हालांकि, पृथ्वी के क्रिकेट खेलने के सपने को सच करने के लिए पंकज ने अपनी दुकान बेच दी | इसकी वजह से वह पृथ्वी को ट्रेनिंग दिलाने में सक्षम हुए और उनके साथ पूरे समय रह भी सके | एक तरह से देखा जाए तो पंकज ने अपनी पूरी जिंदगी पृथ्वी के नाम कर दी | पिता ने अपने करियर और निजी जिंदगी से समझौता किया ताकि बेटे के सपने को पूरा होते देख सकें | पृथ्वी के पिता सुबह साढ़े तीन बजे उठकर बेटे के लिए नाश्ता बनाते थे | सुबह साढ़े चार बजे पिता और बेटे विरार से बांद्रा के एमआईजी ग्राउंड जाते थे, जहां पृथ्वी अभ्यास करते थे | इस दौरान पृथ्वी अपने पिता के कंधें पर बैठते थे |पृथ्वी जहां पूरे दिन अभ्यास करते थे, वहीं उनके पिता पेड़ की छांव में बेटे के खेल पर नजर रखते थे | इसके अलावा कभी उनके पिता स्थानीय बाजार भी जाते थे ताकि बेटे के लिए अच्छे क्रिकेट उपकरण ले सकें | पूरे दिन अभ्यास करने के बाद पृथ्वी और उनके पिता शाम को घर पहुंचते थे | डिनर करने के बाद दोनों शाम साढ़े 9 बजे तक सो जाते थे | यह पृथ्वी शॉ का रूटीन बन चुका था और कड़ी मेहनत का फल उन्हें 4 अक्टूबर 2018 को मिला |

 

पोते की कामयाबी से फूले नहीं समाए दादा-दादी, बांटी मिठाईयां –

पृथ्वी की मां के निधन के बाद पिता पंकज मुंबई में आकर एक कपड़े की दुकान चलाने लगे थे। पृथ्वी शॉ के दादा-दादी भी पैतृक गांव में कटपीस नाम की कपड़े की दुकान चलाते हैं। जब पृथ्वी शॉ ने अपने पहले अंतरराष्ट्रीय मैच में शतक लगाया तो उनके पैतृक गांव में मिठाईयां बांट कर जश्न मनाया गया।

दादा-दादी अपने युवा पोते की शानदार कामयाबी से काफी खुश हैं। इसके अलावा भारतीय क्रिकेट के उभरते सितारे की कामयाबी से पड़ोसी व गांव के अन्य लोगों का सीना भी गर्व से चौड़ा हो गया है।

niraj kumar

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