बच्चे तो कोड़े कागज की तरह होते हैं, सही क्या है, और गलत क्या है क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए पढ़ाई करना जरुरी है या बचपन से हीं भोजन के बंदोबस्ती में लग जाना चाहिए जैसी बातों का मतलब उन्हें नहीं पता | उन्हें जो दिशा निर्देश देंगे वो वही करेंगे | और जब बात बिहार के नक्सल प्रभावित जगहों की हो तो वहां स्थिति और भयावह हो जाती है | क्योंकि वैसे जगहों पर सरकारी स्कुल में भी शिक्षक नक्सलियों के डर के कारण नियमित रूप से पढ़ाने नहीं जाते | इस सारी परिस्थितियों के बीच बिहार के जमुई जिले के खैरा प्रखंड के समीप चंद्रपुर गांव के निवासी अविनाश प्रताप सिंह ( Avinash Pratap Singh )उन गरीब बच्चों के बीच शिक्षा की ज्योत जला रहे हैं, जिनके माता-पिता पैसे के आभाव के कारण अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते हैं |

Avinash Pratap Singh

लड़ते हुए दो बच्चों को देख मिली थी प्रेरणा

27 अप्रैल वर्ष 2017 के दिन घटित एक घटना ने ( Avinash Pratap Singh) अविनाश की जिंदगी को बदल दिया | अविनाश ( Avinash Pratap Singh ) उस दिन अपने खेत से लौट रहे थे, लौटते क्रम में एक जगह दो बच्चों को आपस में लड़ते हुए देखा | जब अविनाश उन बच्चों के समीप गए तो देखते हैं की वे बच्चे कुरकुरे के पैकेट पर लिखे शब्द को लेकर लड़ रहे थे | एक लड़का बोल रहा था की ‘च’ लिखा हुआ है तो दूसरा बोल रहा था ‘क’ लिखा हुआ है |

जब अविनाश ने उन बच्चों से पूछा की तुम लोग पढ़ते हो तो जवाब मिला नहीं हम तो बाबूजी के साथ ईंट बनाते हैं और उनके हमे पढ़ाने के लिए पैसे नहीं है | जब अविनाश ने उन बच्चों से पूछा की बड़े हो कर क्या बनोगे तो एक ने जवाब दिया बड़का बड़का सेठ बनबय तो दूसरे ने बोला डॉक्टर बनबय | बच्चों की इन बातों को सुन दिल भर आया | उस रात अविनाश सो नहीं पाए रात भर यही सोंचते रहें की इन अबोध बच्चों के सपने कितने बड़े हैं पर ये सपने शिक्षा के आभाव में पुरे होने से बहुत पहले हीं दम तोड़ देती है, हमे इन बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए |

Avinash Pratap Singh

‘निःशुल्क ज्ञान निकेतन’ की नीव डाली

1 मई 2017 को ( Avinash Pratap Singh ) अविनाश कुमार सिंह ने अपने सोंच को ‘निःशुल्क ज्ञान निकेतन’ के माध्यम से धरातल पर लायें | पर सबसे बड़ी समस्या थी बच्चों को पढ़ने के लिए तैयार करना था, क्योकि अविनाश जिस जगह से ताल्लुक रखते हैं वहां के माता पिता अपने बच्चों को कमाई का एक जरिया मानते थे वैसे में उन लोगों को तैयार करना काफी मुश्किल भरा काम था, पर अविनाश भी जुनूनी थे, वे रात में गांव में जा कर बच्चों के माता पिता को समझाते थे साथ हीं बच्चों को टॉफी का लालच देते थे ताकि वो पढ़ने आ जाये |

Avinash Pratap Singh

आज सैकड़ो बच्चे पढ़ते हैं निः शुल्क ज्ञान निकेतन में

शुरुवाती दौड़ में अविनाश गिरे उठे और निरंतर चलते रहे और यही कारण रहा की आज ( Avinash Pratap Singh ) अविनाश के निः शुल्क ज्ञान निकेतन में बच्चों की संख्या 100 से ऊपर है | शुरू में अविनाश घर-घर जाकर ट्यूशन पढ़ाकर कमाए थोड़े से पैसे से इन बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करते थे पर वो काफी नहीं होते थे | लेकिन खा जाता है की जब आप किसी नेक काम को करते हैं तो भगवान स्वयं आकर मदद करते हैं कुछ ऐसा हीं अविनाश के साथ भी हुआ | अपने बच्चों के पाठ्य सामग्री के लिए सोशल मिडिया पर लोगों से मदद मांगते थे | जब उनका एक पोस्ट बांका जिले की रहने वाली अमिता पम्मी जी के पास गया तो वो फ़ौरन अविनाश से संपर्क की और अविनाश के मुहीम की काफी प्रसंसा भी की और मदद का आश्वासन भी दिया | अमिता पम्मी जी के प्रयास का भी नतीजा था की पूर्व शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी जी अविनाश के पास कॉल किये और पटना बुला कर 600 पुस्तक दे कर मदद किए |

परिवार वाले नकारा समझते थे अविनाश को

किसी आम भारतीय परिवार की तरह की सोंच थी अविनाश के परिवार की वे लोग अविनाश को अपने पुश्तैनी दुकान में काम करते देखना चाहते थे या फिर किसी सरकारी नौकरी में | जब अविनाश ने निः शुल्क ज्ञान निकेतन की नीव डाली और पैसे के आभाव में घर-घर जा कर ट्यूशन पढ़ाया करते थे तब परिवार के लोग बोलते थे की हमारा लड़का घर-घर जा कर भीख मांगता है | पर इन बातों से अविनाश पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा क्योकि उनका सपना सिर्फ अपना घर रौशन करने का नहीं बल्कि उन लोगों के घर को रौशन करना था जिनके सपने पैसे के आभाव में दम तोड़ देती है | आज हमारे देश को एक नहीं हजारो अविनाश की जरुरत है | भले अविनाश प्रताप सिंह को अपने परिवार से सपोर्ट नहीं मिला पर अविनाश के कारण ही वो परिवार धन्य हो गया जिस परिवार ने अविनाश जैसे सुपुत्र को जन्म दिया |

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
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