आज हम बात कर रहे है ऐसे व्यक्तिव की जिसने दुनिया ने भुला दिया पर आज वो आज खुद की निशानी तलाश कर रहे है | मैं बात कर रहा हु महान गणितज्ञ डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह ( Dr. Vashisht Narayan Singh ) जी की जो आज वो कहां है इसकी खुद उन्हें भी खबर नहीं है। 40 साल से ये महान गणितज्ञ मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित है और वे आज भी मैथ के फॉर्मूलों को सॉल्व करते रहते हैं।वो अपने शोध में इतने व्यस्त हो चुके थे की उनको पता ही नहीं चला की वो कब  वो मानसिक रोग के गिरफ्त में आ गए |Dr. Vashisht Narayan Singh बिहार के एक ऐसे वशिष्ठ शख्सियत है जिन्होंने आइंस्टिन के सिद्धांत के साथ- साथ गौस की थ्योरी को भी चैलेंज किया था|

Dr. Vashisht Narayan Singh

अपने प्रतिभा के दम पे पुरे विश्व में बनाई अपनी अलग ही पहचान

Dr. Vashisht Narayan Singh जी को जब अमेरिका में पढ़ने का न्योता मिला तो उन्होंने ग्रेजुएशन के तीन साल की अवधि को महज एक साल में पूरा कर लिया था। Dr. Vashisht Narayan Singh का जन्म आरा जिला के संतपुर गांव में एक गरीब किसान परिवार में हुआ था।यह गांव आरा मुख्यालय से 12 किलोमीटर की दूरी पर है। इन्होने ने छठवीं क्लास में नेतरहाट स्कूल में एडमिशन लिया था और दशवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की औरपूरे बिहार में टॉप किया। इंटर की पढ़ाई के लिए पटना साइंस कॉलेज में एडमिशन लिया और वहां भी पूरे बिहार में टॉप किया|

Dr. Vashisht Narayan Singh

1960  में जब बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग का नाम पूरी दुनिया में था तब देश-विदेश के दिग्गज भी यहां आते थे। उसी दौरान कॉलेज में एक मैथमेटिक्स कांफ्रेंस का आयोजन किया गया।इस कांफ्रेंस में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बार्कलेके एचओड प्रो जॉनएल केली भी मौजूद थे। उस वक़्त उन्हें कांफ्रेंस में मैथ के पांच सबसे कठिन प्रॉब्लम्स दिए गए ,जिसे होनहार बच्चे भी हल करने में असफल हो गए,लेकिन सिंह ने पांचों सवालों के सटिक जवाब दिए।उनके इस जवाब से प्रो केली काफी प्रभावित हुए और उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका आने का न्योता दिया,पर उन्होंने अपनी परिस्थितियों से अवगत कराते हुए कहा कि वे एक गरीब किसान परिवार से हैं और अमेरिका में आ कर पढ़ाई करना उनके लिए मुनासिब नहीं है।ऐसे में प्रो केली ने उनके लिए विजा और फ्लाइट टिकट का इंतजाम किया और उन्हें अमेरिका बुलाया।

तब उन्होंने अमेरिका के कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से  PhD ( डॉक्टरेट) की उपाधी पाई और ‘साइकिल वेक्टर स्पेश थ्योरी’ पर शोध कार्य किया और पूरे दुनिया में अपनी एक अलग पहचान से मसहूर हो गए| अपने इस शोध कार्य को पूरा कर डॉ सिंह Dr. Vashisht Narayan Singh वापस भारत लौट आए और कुछ वक़्त पश्चात फिर दोबारा अमेरिका चले गए।तब इन्हें वाशिंगटन में एसोसिएट प्रोफेसर बनाया गया फिर वो वापस भारत लौट आए।तब उन्हें प्रोफेसर डॉ केली और नासा ने रोकना चाहा, लेकिन वे नहीं माने और वो 1971 में भारत हमेशा के लिए वापस आ गए।1971 में वापस आने के बाद इन्हें आईआईटी कानपुर में प्राध्यापक बनाया गया।महज 8 महिने काम करने के बाद इन्होंने बतौर गणित प्राध्यापक ‘टाटा इंस्टीच्युट ऑफ फण्डामेंटल रिसर्च’ ज्वाइन कर लिया। एक साल बाद 1973 में वे कोलकाता स्थित आईएसआई मे स्थायी प्राध्यापक नियुक्त किए गए।

Dr. Vashisht Narayan Singh

वक़्त के साथ बीमारी और सदमे के हो गए थे शिकार

Dr. Vashisht Narayan Singh की  शादी  1973 में वंदना रानी सिंह से हो गई | तब घर वाले बताते हैं कि यही वह वक्त था जब वशिष्ठ जी के असामान्य व्यवहार के बारे में लोगों को पता चल| .उनके आसमान व्यवहार से उनकी पत्नी ने भी तलाक़ ले लिया जो वशिष्ठ नारायण के लिए बड़ा झटका साबित हुआ .तक़रीबन इसी वक्त जब वह आई एस आई कोलकाता में अपने सहयोगियों के बर्ताव से भी परेशान थे| क्यूंकि कई प्रोफ़ेसर्स ने उनके शोध को अपने नाम से छपवा लिया था जिसके कारण वो बहुत चिंतित और परेशान रहने लगे | गरीब परिवार होने के कारण उनका परिवार सही इलाज नहीं करवा सके| घर वालों के मुताबिक़ इलाज अगर ठीक से चलता तो उनके ठीक होने की संभावना थी| 1976 में उन्हें रांची में भर्ती करवाया गया उसके बाद भी कई जगहउ न्हें दिखाया गया, लेकिन परिवार वालों पर ग़म का पहाड़ उस वक्त टूटा जब इलाज के सिलसिले में बाहर गए वशिष्ठ नारायण घर लौट रहे थे तभी रात के अंधेर में ट्रेन से उतरे और जाने कहां गुम हो गए।

।करीब 5 साल बाद शादी में गए गांव के कुछ लड़कों ने उन्हें सारण में देखा।वो बेहद दयनीय हालत में थे, पर आज वो पहले से बेहतर हैं इसलिए परिवारवालों को उम्मीद है कि एक दिन वो बिल्कुल ठीक हो जाएंगे।आज जिस शख्स को भारत सरकार को सम्मानित करना चाहिए था उसे सम्मान तो दूर की बात है आज तक इलाज के नाम पर एक पैसे की मदद भी नहीं मिली ।उम्मीद करता हूं आर्यभट्ट की इस ज़मी पर रहने वाले वशिष्ठ बाबू को वो सम्मान और सहायता मिले जिसके वे हक़दार है| |

आज वर्ष के हर  4  मार्च को मैथ डे के साथ – साथ पाई डे केरूप में भी मनाया जाता है।जो मुख्य रूप से एक ऑनलाइन प्रतियोगिता था और इसकी शुरुआत  2007  से हुई थी। Dr. Vashisht Narayan Singh जिनका लोहा पूरा विश्व मान रहा है | जिन्होंने कई ऐसे रिसर्च किए, जिनका अध्ययन आज भी अमेरिकी छात्र कर रहे हैं |