सेवाभाव अर्थात दूसरों की सेवा करने का जज्बा कमोबेश हर व्यक्ति में होता है  अगर हम कोई नेक काम कर रहे हैं तो हमें इस बात पर पूरा भरोसा रखना चाहिए कि ईश्वर हमारी जरूर मदद करेगा | आज की हमारी कहानी भी एक ऐसे ही एक व्यक्ति की हैं जिनके एक सार्थक पहल ने गरीबों व् असहायों के चेहरे पर मुस्कान ला दिया |

गर्मी  का मौसम था हमेशा की तरह संदीप बंसल अपने क्लीनिक जा रहे थे,  बस स्टैन्ड के पास पहुंचते ही संदीप बंसल की  नजर तपती सड़क किनारे नग्न अवस्था में बैठे एक  बुजुर्ग पर पड़ी, जो ऊपर से तेज धूप की तपन से तिलमिला रहा था और नीचे से आग उगलती सड़क पर नंगे पैर को सिकोड़ रहा था। संदीप बंसल से रहा नहीं गया बस उससे पूछ बैठा कि बाबा क्या आपके पास कपडे़े और चप्पल नहीं है। सुनकर बाबा बोले बेटा गरीबों के पास कपड़े कहां होते हैं। इतना सुनते ही संदीप बंसल की आंखें नम हो गईं। उसकी दर्द भरी आवाज में कुछ आशाएं झलक रहीं  थीं। बस इतना सोचकर मैं एक जूते चप्पल की दुकान की तरफ बढ़ा, कुछ दूर चला ही था कि पीछे मुड़कर देखा कि वह बुजुर्ग वहां से जा चुका था। शायद उसको ये एहसास हुआ होगा कि लोग पूछकर चले जाते हैं, देने वाला कोई नहीं है। क्लीनिक गया दिन भर मरीजों से मिलता रहा, लेकिन दिल और दिमाग में सिर्फ उस बुजुर्ग का चेहरा आंखों के सामने बार-बार आ रहा था।

दिल्ली में मिला मिला था नेक द्वार का आइडिया

उसके कुछ समय बाद दिल्ली में पढ़ाई कर रहे अपने होनहार बेटे से मिलने जब दिल्ली गया तो बस दिल्ली पहुंचा ही था। इद्रापुरम से गुजर रहा था, तभी सामने एक दीवाल पर नेक द्वार लिखा दिखाई दिया, जहां कुछ कपड़े टंगे थे, वही नीचे जमीन पर कुछ पुराने जूते चप्पल भी रखे थे। मन नहीं माना तो वहां जाकर लोगों से पूछा तो उन्होंने जो बताया वह सुनकर मेरे जेहन में तमाम लहरे उठने लगी। बस वही करने का ठान लिया। ये वाक्या है जिले के पुखरायां निवासी डॉ. संदीप बंसल का है, जो उस बुजुर्ग जैसे तमाम लोगों के लिये कुछ कर गुजरने की ठान चुके थे। अब उन्हे घर पहुंचने का इंतजार था।

16 मार्च 2017 को  शुरू किया नेक द्वार

वापस घर आकर उन्होंने इस बारे में कई लोगों से सलाह ली, लेकिन लोगों की नकारात्मक सोच उन्हें डिगा नहीं पाई। इस बीच उनके सहयोगी डॉ. धीरेंद्र सचान एवं दिवाकर जी ने उन्हे हौंसला देते हुये नेक काम बताकर सहयोग देने की बात की। इसके बाद डॉ. संदीप बंसल ने 16 मार्च 2017 को पुखराया के आनंदेश्वर मंदिर के पास एक खंडहर रूपी जगह पर नेक द्वार का शुभारम्भ किया। जहां दीवाल पर लिखा है… जिसके पास अधिक हो रख जाये, जिसको जरूरत हो ले जाये। यह पंक्ति गरीबों के लिये रामबाण साबित हुयी। फिर क्या असहाय असमर्थ लोग वहां आकर अपने जरूरत के कपड़े, जूते-चप्पल व बैग निशुल्क ले जाने लगे |

क्या है नेक द्वार जानिए

कुछ लोग घरों में नये कपड़े, जूते-चप्पल व बैग आदि अन्य सामान लाकर महज कुछ दिन प्रयोग करके रख देते है। वही कपड़े, जूते-चप्पल व बैग साफ कराकर नेक द्वार में आकर दान करना होता है, जिसके एवज में कोई देय नहीं होता है। धन की आवश्यकता पडने पर टीम के लोग निजी धन खर्च करते है। वहीं जिस गरीब को आवश्यकतानुसार जो सामान यहां से चाहिये होता है वह बिना शुल्क दिये ले जा सकता है। नेक द्वार का शुभारम्भ गरीबों के लिये किया गया है।

 

niraj kumar

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
niraj kumar

Latest posts by niraj kumar (see all)