हर एक व्यक्ति के अंदर  एक कवि है, पर जरुरी नहीं हर कोई के पास अपने कला को आकार  दे पाए| आज हम बात कर  रहे है ऐसे शख्स  की जो अपने कला को एक आकार  दिया और पूरी दुनिया के सामने खुद की एक मिशाल कायम की |

69 वर्षीय  हलधर नाग जो अभी तक  5 पीएचडी की डिग्री ले  चुके है |

हम बात कर  रहे है ओडिशा के बारगढ़ में एक गरीब परिवार  जन्मे  69 वर्षीय  हलधर नाग की| जो अभी तक  5 पीएचडी की डिग्री ले  चुके  हैं |हलधर नाग   एक कोसली भाषा के कवि है | जो  बिना किसी किताब का सहारा लिए, अपनी कविताएँ सुनाने के लिए जाने जाते हैं। इनकी सारी कवितायें   सामाजिक मुद्दों पे आधारित होती   है |

1990 में प्रकाशित पहली कविता  ‘ढोडो बरगाछ’ से मिली एक नई पहचान |

जब इन्होने 1990 में अपनी पहली कविता  ‘ढोडो बरगाछ’ (पुराना बरगद का पेड़)लिखी जो  एक स्थानीय पत्रिका में प्रकाशितकी गयी थी| उसके बाद इन्होने चार और कवितायेँ भेज दी और वो सभी प्रकाशित हो गए थे ।जो  आलोचकों और प्रशंसकोंके बीच काफी सराहा गया था| जिसके कारण ये  ‘लोक कवि रत्न’नाम पहचाने जाने लगे |  इसके बाद उन्होंने कभी दुबारा पीछे मुड़कर नहीं देखा।

20 महाकाव्य को कंठस्थ कर चुके हलधर नाग को राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री से किया जा चुका है सम्मानित |

जब ये  10 साल के थे, तब इनके  पिता की मृत्यु हो गई थी आर्थिक तंगी के कारण  इन्होने तीसरी कक्षा के बाद पढाई छोड़ दी थी और इसके  के बाद इन्होने एक मिठाई की दुकान पर बर्तन धोने का काम करना शुरू कर दिया था | जहाँ उन्होंने 16 साल तक नौकरी की।जब उन्हें स्कूल में काम करते हुए,  महसूस हुआ  कि उनके गाँव में बहुत सारे स्कूल खुल रहे हैं तो उन्होंने  एक बैंक से संपर्क किया और स्कूली बच्चों  के लिए स्टेशनरी और खाने-पीने की एक छोटी सी दुकान शुरू करने के लिए 1000 रुपये का ऋण लिया।

69 वर्षीय हलधर नाग को अपनी लिखी सारी कविताएं और  20 महाकाव्य कंठस्थ हैं। संभलपुर विश्वविद्यालय में अब उनके लेखन के कलेक्शन ‘हलधर ग्रंथावली-2’ को पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है और साथ साथ इन्हे 2016 मे राष्ट्रपति के द्वारा  पद्मश्री से भी सम्मानित किए जा चुके है |