आज पर्यावरण संरक्षण की स्थिति दिन व दिन खत्म होती जा रही है | हर कोई पेड़ पौधे से लाभ ले रहे है पर उनके संरक्षण के लिय कोई नहीं सोचता | आज भी बहुत ऐसे लोग है जो प्रकृति प्रेमी है जो इनके संरक्षण में आज कदम से कदम मिला कर चल रहे है |

असम के एक दम्पति जो प्लास्टिक के कम उपयोग के प्रति लोगों कर रहे है जागरूक |

आज हम बात कर रहे है एक ऐसे दम्पति की जो न केवल गरीब बच्चों के लिए स्कूल चला रहे है बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी अपना सहयोग दे रहे है |आज  प्लास्टिक का ज्यादा उपयोग होने के कारण धरती पर मौजूद तमाम जीव जंतुओं के लिए एक संकट बनता जा रहा है| प्लास्टिक का उपयोग कम से कम करने के लिए कई सारे प्रयास किए जा रहे हैं। असम में एक दम्पति के दवारा अक्षर स्कूल चलाया  जाता  है जिसमे  बच्चों को फीस की जगह प्लास्टिक खोजकर लाने को कहा जाता है |  इस पहल से  न केवल प्लास्टिक का उपयोग  कम हो  रहा है बल्कि लोगों के बीच जागरूकता भी फैलाई जा रही है।

असम के परमिता सरमा और माजिन मुख्ता नामक दम्पति ने की है अक्षर स्कूल की स्थापना|

इस  स्कूल की स्थापना जून 2016 में परमिता सरमा और माजिन मुख्तार ने की थी।और आज इसमें 4 से 15 साल तक के 100 से भी अधिक बच्चे अध्ययनरत हो चूका हैं। इसे इंडियन ऑयल द्वारा वित्तीय सहायता मुहैया कराई जा रही है। ‘ माजिन मुख्तार के अनुसार , यहाँ के स्थानीय ग्रामीण ढेर सारा प्लास्टिक इकट्ठा होने पर उसे जला देते थे। जिससे  पर्यावरण में जहरीली हवा की मात्रा बढ़ जाती थी।अक्षर स्कूल के बच्चों के दुवारा  इकट्ठा किय गए प्लास्टिकों  से कई तरह के उपयोगी उत्पाद बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है। इससे बाउंड्री वॉल, टॉयलेट, ईंट और प्लांट गार्ड्स बनाया जा रहा है। प्लास्टिक की चीजों को स्कूल में लगाने से बारिश के समय में होने वाली फिसलन को भी रोका जाता है। एक एकड़ में फैले इस स्कूल जिसमे दो सीनियर अध्यापक और चार जूनियर अध्यापक हैं।  इस स्कूल में पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे गरीब और पिछड़ी पृष्ठभूमि से आते हैं, इसलिए उन्हें रोजगार प्राप्त करने के लिए कई तरह की ट्रेनिंग भी दी जाती है।


अक्षर स्कूल जहाँ बच्चों का दाखिला उम्र के हिसाब से नहीं बल्कि उनके कौशल के आधार पे होती है |

माजिन मुख्तार के अनुसार इस स्कूल के बच्चे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑपन स्कूलिंग के जरिए पंजीकृत हैं। इससे बच्चों को अधिक बेहतर तरीके से चीजों को समझने की क्षमता विकसित होती है।’ स्कूल में बच्चों का दाखिला उनकी उम्र के हिसाब से नहीं बल्कि उनके कौशल के आधार पर होता है। इतना ही नहीं, बड़ी कक्षाओं के बच्चे भी छोटी कक्षाओं के छात्रों को पढ़ाते हैं।