एक शहर जहाँ लोग अपनी बच्चों को उच्च शिक्षा  के लिया भेजते है या कोई अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिया शहर  की ओर  रुख करते  है क्योंकि उसके मन मे  कही न कही एक आशा होती है की मैं अपने मेह्नत  के  दम पे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधार  सकता हु और और अपने बच्चे को उच्च शिक्षा भी दिला सकता हूँ | आज देश के हर एक गांव  से  लाखों ऐसे परिवार है जो इस सोंच के साथ शहर की और रुख करते है |

  बिहार के कैमूर भभुआ जिले के थाना रामगढ़, के युवा जिन्होंने नौकरी छोड़ खुद को इस काम मे कर दिया समर्पित |

कोई भी आम इंसान अपने बलभुते पे शहर की ओर  रुख करते है क्यूंकि वो बखूबी जानते है यहाँ कोई अपना नहीं होता और किसी से मदद मिलना तो दूर की बात है सोंच सब के मन मे  रहती है | पर वो कहते है बदलाव ही संसार का नियम है ये  बात  आज कही न कही सच हो रही है क्यूंकि आज युवा बदल रहा है पहले लोग गांव में एक दूसरे की मदद किया करते थे जहाँ शहर को इस बात से कोई ताल्लुक ही  नहीं था पर आज या साडी बातें शहर मे  भी देखने को मिल रहा है| आज हम बात कर रहे है एक ऐसे शख्स  की जिनका नाम राघवेंद्र कुमार है | 32 साल के इस युवा के मन में शिक्षा का संस्कार बांटने की ललक इतनी है कि  उसने नौकरी छोड़ खुद को इसी काम में समर्पित कर दिया है। पटना में हमेशा एक आदमी जो कभी किताब तो कभी हेलमेट बाटते  हुए नजर आता है मानो जैसे  कोई ऐसी घटना घटी हो जो उसे झकझोर के रख दिया हो | ये  बिहार के कैमूर भभुआ जिले के थाना रामगढ़, ग्राम बगाढ़ी के निवासी है |

हेलमेट मैन के नाम से पहचाने जाते है ३२ वर्ष  के युवा राघवेंद्र कुमार

जो आज हेलमेट मैन  नाम से जाने जाते है | आज इनके  काम का दायरा पुरे भारत मे  फैला है |इन्होने अपने हेलमेट मैन बनने की कहानी ग्रेटर नोएडा से शुरू की थी बात या तब की है जब ये ग्रेटर नॉएडा से लॉ की पढाई कर रहे थे जहाँ इनके रूम पार्टनर कृष्ण कुमार थे जो की पेशे एक इंजीनियर थे |  जब कृष्ण कुमार फाइनल ईयर मे  थे तो उनकी मौत एक सड़क हादसे में हेलमेट नहीं पहनने के कारण  हो गयी |  कृष्ण कुमार जो अपने माँ बाप की एकलौते संतान थे उनकी एक मात्र बुढ़ापे का सहारा था |इस दुर्घटना के बाद मानो उनके माँ बाप पे जैसे मुसिबतों  का पहाड़  टूट पड़ा क्योंकि उनके घर का चिराग बुझ चूका था | ये घटना मेरे ज़ेहन को झकझोर गयी |   और तभी मैंने प्रण  लिया की  हेलमेट की आवश्यकता-अनिवार्यता पर अभियान चलाऊंगा, ताकि भविष्य में किसी मां-बाप को अपने घर चिराग न खोना पड़े |आज आए दिन लाखों ऐसी  घटनाएं देखने सुनने को मिलती है एक हेलमेट नहीं लगाने के कारण कई लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते है | इसी घटना से प्रेरित होकर मई लोगों के बीच जागरूक अभियान शुरू किया |

सड़क दुर्घटना से मिले सबक से आज भारत के बड़े- बड़े शहरों में फैला रहे है जागरूकता |

घटना के बीते  एक साल भी नहीं हुए थे मैंने 2015 से ही लोगों को हेलमेट देकर जागरूक करने का अभियान शुरू कर दिया था | राघवेंद्र के अनुसार , मै  हर रोज उस चौक चौराहे पे हेलमेट लेकर खड़ा रहने लगा जहाँ लोगों का 24घंटे आना जाना लगा रहता था | जब लोग मेरे हाथ में देने के लिए लोग हेलमेट देखते थे तो उनके चेहरे पर खुशी झलकने लगती थी। क्योंकि उन्हें लगता था की आज भी कोई अपना जो मेरा ख्याल कर रहा है | राघवेंद्र का कहना था की  जितने हेलमेट मे   बांटता, उतनी ही खुशी मुझे मिलती।  अपने दोस्त कृष्ण कुमार की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद जब  मैं उसके घर गया था, तो उसकी किताबें मैंने किसी गरीब बच्चे को दे दी थी। किताबें मुफ्त में मिल जाने पर उस बच्चे के चेहरे की खुशी मुझे अब तक याद है। उस दिन दिन मानो जैसे मेरी ज़िन्दगी का उसूल बन गया |   एक दिन अचानक मेरे फोन पर कॉल आया, एक मां का।  जिसके बेटे को मैंने अपने दोस्त की किताबें दी थीं, उसका बेटा उन्हीं किताबों को पढ़ कर पूरे जिले में प्रथम स्थान पाया हैl या बात सुनकर मुझे इतनी खुसी मिली जिसे बयां  करने के लिया मेरे पास अल्फ़ाज़ काम पड़  गए |  मैं यह सोचने लगा कि जिस मां-बाप का बेटा दुनिया से चला गया, उसकी किताबों ने  एक और मां-बाप का घर आबाद कर दिया।उसी वक़्त मैंने सोचा लिया था की क्यों न मै लोगों से पुरानी किताबें लेकर बदले मे उनको  हेलमेट दिया जाये और भारत के कोने-कोने तक एक अभियान के तहत सड़क सुरक्षा और शिक्षा दोनों में जागरूकता फैलायी जाये।इसी अवधारणा के साथ मैं अपने कार्य जुट गया। जो लोग मुझे पुरानी किताब देते हैं, उसके बदले में मैं उनको हेलमेट देता हूं।अब तक भारत के लगभग  9 राज्यों को मैंने अपना कार्यक्षेत्र बनाया है जहाँ मै  20000 से भी ज्यादा  हेलमेट बांट चुका हूं और डेढ़ लाख बच्चों तक इस अभियान के तहत पुरानी किताबें दे चुका हूं। इस कार्य में जो भी पैसे लगे वो मेरे अपने थे आप इसे धन की बर्बादी बोले या कुछ और क्योंकि इसमें मैंने अपने अपने दिल्ली स्थित अपने घर को बेच दिया था पैसे की कमी होने के कारण  |

लेकिन मुझे खुशी है कि मैंने नेक काम में इन रुपयों को खर्च किया |  मेरे जीवन में इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव भी नहीं पड़ा है। मैं इसी से खुश हूं कि मेरी वजह से आज कई घरों में खुशियों की बरसात हो रही है।

आज पुस्तकों का बंडल बनाते हैं , ER11 बुक बैंक के माध्यम से |

इन्होने  शहर में जगह जगह ER11  बुक बैंक बॉक्स लगाना चालू किया कर दिया है। इस बॉक्स की एक खासियत है। आपके पास कोई भी पुरानी किताब है, उसको बॉक्स में डाल दीजिए और जब यह बॉक्स भर जाता है तो किताबें निकाल कर हम लोग अलग-अलग क्लास के लिए अलग-अलग पुस्तकों का बंडल बनाते हैं और सिक्स क्लास से ट्वेल्थ क्लास के बच्चों को निःशुल्क देते हैं।अभी ऐसे बॉक्स दिल्ली महानगर में हरिद्वार, फरीदाबाद, बनारस, पटना में लगे हुए हैं। यह बॉक्स सड़क सुरक्षा और शिक्षा दोनों का कार्य कर रहा है।

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
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