एक माइक्रोग्रिड जो की एक बिजली स्रोतों का एक स्थानीयकृत समूह है। एक माइक्रोग्रिड प्रभावी रूप से वितरित पीढ़ी (डीजी) के विभिन्न स्रोतों को एकीकृत कर सकता है, विशेष रूप से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (आरईएस) – नवीकरणीय बिजली, और आपातकालीन बिजली की आपूर्ति कर सकता है, द्वीप और जुड़े मोड के बीच बदल रहा है।

नवीकरणीय बिजली, और आपातकालीन बिजली की आपूर्ति करने वाला भारत का सबसे बड़ा माइक्रोग्रिड ग्रीन लैंडस्केप प्रोजेक्ट|

स्टैंडअलोन सिस्टम क्लस्टर(वह प्रणाली जो ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में केवल सौर विद्युत ऊर्जा का उपयोग करती है, जिसको स्टैंडअलोन सौर विद्युत प्रणाली कहा जाता है। इस धरती पर ऐसे कई स्थान हैं जहाँ बिजली का कोई स्रोत उपलब्ध नहीं है। इन स्थानों पर स्टैंडअलोन सौर विद्युत प्रणाली बिजली का आदर्श स्रोत हो सकती है। इस प्रणाली का मुख्य लाभ यह है कि यह ग्रिड या बिजली के किसी अन्य स्रोत पर निर्भर नहीं करता है।) के साथ यह ग्रीन लैंडस्केप प्रोजेक्ट भारत का सबसे बड़ा माइक्रोग्रिड है जिसे मुरेहरा गांव, कैमूर, बिहार में स्थापित किया गया है। इसने लगभग 44,000 परिवारों के जीवन को सफलतापूर्वक छू  लिया है, जो 240 गांवों में फैले हुए हैं, जहां लोग खुश हैं कि सस्ती दरों पर बिजली मिल रही है। कार्यक्रम के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र-

चंपारण में 96 माइक्रोग्रिड नेटवर्क हैं

सुपौल जिले में 77 माइक्रोग्रिड हैं

कैमूर जिले में 140 माइक्रोग्रिड हैं

वाल्मीकि टाइगर रिजर्व

ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहे  बिजली की कमी इस परियोजना को लाने का एक बड़ा मुख्य उदेश्य था|

प्रोजेक्ट की शुरुआत एक सर्वे के दुवारा हुई थी,जो डोर टू डोर था |  ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहे  बिजली की कमी इस परियोजना को लाने का एक बड़ा मुख्य उदेश्य था। स्टैंडअलोन प्रणाली जो की विरल आबादी वाले गांवों में बिजली लाने का एक जरिया था जिसमे प्रत्येक घर के लिए एक सौर पैनल, घर में बिजली लाने वाली एक केबल की जरूरत थी | इस माध्यम से  लगभग 12,000 परिवारों को इस तरह से अपना पहला इलेक्ट्रिक लाइट और पंखा मिला। कैमूर जिले को सबसे अधिक – 3,396 प्रणालियाँ मिलीं, इसके बाद सुपौल (2,720), पशिम चंपारण (1,283) और रोहतास (1,607) रहे।

इस परियोजना का सर्वे के माध्यम से पता चला है की  8 जनवरी 2018 के समय , भारत में 63 माइक्रोग्रिड या नेटवर्क थे  एक विशेष क्षेत्र में बिजली पैदा करते थे और वितरित करते थे, जिसमें 1.9 मेगावाट की उत्पादन क्षमता थी लेकिन अब वो बढ़ कर अब  लगभग  373 माइक्रोग्रिड और 12.8 मेगावाट की क्षमता में तब्दील हो चुकी है |

इस परियोजना के तहत गांवों को बिजली के वाहनों और कोल्ड-स्टोर सब्जियों को चार्ज करने मे मिल रही है मदद |

इस परियोजना का विस्तार करते हुए, जापान के मित्सुई के साथ तीन जिलों – नालंदा, सुपौल और अररिया में भागीदारी के साथ प्रयोग किया जा रहा है, जिससे गांवों को बिजली के वाहनों और कोल्ड-स्टोर सब्जियों को चार्ज करने का साधन उपलब्ध कराया जा रहा है।

बिहार में सौर ऊर्जा का इस तरह का सकारात्मक उपयोग एक बदलाव का कदम है जो आने वाले दिनों में 100 और गांवों में ग्रिड पावर के पूरक बनने में मदद करेगा।