ये देखो संप्रदा का खेल, पढ़े फारसी बेचे तेल ! कुछ इसी तरह के मजाकिया कहावत का इस्तेमाल  जहानाबाद के मोदनगंज प्रखंड के ओकरी गांव में  लोग सम्प्रदा सिंह के लिए करते थे, लेकिन उसी संप्रदा ने ऐसा खेल रचा कि ओकरी और जहानाबाद ही नहीं बल्कि पूरे बिहार को अपने इस लाल पर गर्व होने लगा | भले आज सम्प्रदा सिंह इस दुनिया में नहीं हैं पर, वे उस मुकाम पर पहुंचे जहां आज तक कोई दूसरा बिहारी नहीं पहुंच पाया था |

सफर फर्श से अर्श तक का

बिहार के जहानाबाद जिले के मोदनगंज प्रखंड के ओकरी गांव में एक किसान के घर जन्मे संप्रदा सिंह ने दुनिया भर में अपने प्रदेश का नाम रोशन किया  उनकी एक समय उनकी कंपनी का कारोबार 100 करोड़ डॉलर यानि तकरीबन 7 हजार करोड़ रूपये तक पहुंच गया था यही कारण था की सम्प्रदा सिंह को  फोर्ब्स पत्रिका ने वर्ष  2017 में देश का 43वां सबसे अमीर व्यक्ति घोषित किया |  उस समय फोर्ब्स ने उनकी संपत्ति 21 हजार करोड़ रूपये से ज्यादा की आंकी थी | पर उनका ये सफर कतई आसान न था | बिना किसी गॉड फादर के संप्रदा सिंह का यह स्वर्णिम सफर उनके मजबूत इरादों की हीं दें थी |

संप्रदा बाबू ने अपनी पढ़ाई जहानाबाद के घोषी हाई स्कूल से की थी, बाद में गया से बी कॉम किया |  उस दौर में बी कॉम बहुत बड़ी बात होती थीऔर  तुरंत अच्छी नौकरी मिल जाती थी, लेकिन उन्होंने खेती करने की सोची |  संप्रदा सिंह अपने गांव आये और आधुनिक तरीके से खेती करने की तैयारी की, लेकिन उसी साल अकाल पड़ा और उनकी सारी कोशिशें बेकार हो गयी |  गांव वाले तभी कहते थे-देखो रे संप्रदा का खेल-पढ़े फारसी बेचे तेल |

पार्टनरशिप में दवा दुकान खोली

खेती से निराश संप्रदा सिंह ने एक निजी स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, लेकिन कम वेतन मिलने के कारण उस पैसे से  खर्च चला पाना भी मुश्किल था, लिहाजा पटना चले आये और दवा दुकान पर काम करना शुरू दिया |  फिर वो दौर भी आया जब खुद की दवा दुकान खोली, लक्ष्मी पुस्तकालय के परमेश्वर बाबू के साथ उन्होंने पार्टनरशिप में दवा की दुकान पटना के खुदाबख्श लायब्रेरी के पास शुरू की, पर किसी कारण वस्  दोनों के बीच ज्यादा दिन निभ नहीं पायी, लिहाजा पार्टनरशिप टूटा और संप्रदा सिंह ने अपना कारोबार शुरू कर दिया

महज एक लाख की पूंजी से कंपनी की शुरुवात हुई

वो 1970 का दौर था जब दोस्तों से एक लाख का कर्ज लेकर संप्रदा सिंह मुंबई पहुंच गये, वे दवा कंपनी खोलना चाहते थे | इस बात का  लोगों ने मजाक उड़ाया की भला एक लाख में दवा कंपनी खुलती है |  पर मजबूत इरादों वाले  संप्रदा सिंह पीछे हटने वालो में से नहीं थे और पैसे की किल्लत में हीं सही पर अल्केम की कंपनी की नीव डाल दी | संप्रदा सिंह अपनी कंपनी के लिए दवा दूसरे दवा  फैक्ट्री से बनवाते थे थे चुकी डॉक्टरों से संबंध पहले से ही बना था लिहाजा दवा बिकनी भी शुरू हुई | फिर अपनी फैक्ट्री डाली जिसने इतिहास रच दिया |  अल्केम फार्मा देश की पांच सबसे बडी कंपनियों में से एक बन गयी |  संप्रदा सिंह  की इस कामयाबी का सबसे बड़ा रहस्य था  कि उन्होंने अपने पूरे परिवार को समेट कर रखा | खुद कंपनी के चेयरमैन थे तो भाई वासुदेव प्रसाद सिंह को कंपनी का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाये रखा |  उनका लंबा चौड़ा परिवार अल्केम से जुड़ा ही नहीं बल्कि हिस्सेदार भी है |  इसी पारिवारिक एकता ने अल्केम को कभी पीछे नहीं जाने दिया |

भले आज संप्रदा सिंह इस दुनिया में नहीं हैं पर दुनिया को जूनून की एक नई परिभाषा दिखा कर गए | दवा दुकान की नौकरी से देश की पांचवी सबसे बड़ी दवा कंपनी का मालिक बन जाने का सफर संप्रदा सिंह जैसे जुनूनी ही तक कर पाते हैं

 

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
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