वर्तमान के बारे में यदि जानना है तो इतिहास के पन्नों में पलटना  होगा और  खासकर बिहार के इतिहास के बारे में जानकारी लेनी है तो पटना म्यूजियम का नाम सबसे पहले आता है क्यूंकि इससे अच्छा कोई स्थान नहीं है जो बिहार के इतिहास को बयाँ कर सके ।

इंडियन म्यूजियम के नाम जाना जाता है पटना संघ्रालय

यहां एक छत के नीचे बिहार की समृद्ध विरासत की झलक देखने को मिल जाती है ।सन 1912 से पूर्व बिहार, बंगाल और ओडिसा तीनों राज्य एक थे जहाँ बंगाल प्रेसिंडेसी के नाम से जाना जाता था। इस क्षेत्र में सिर्फ एक संग्रहालय हुआ करता था। जिसको इंडियन म्यूजियम के नाम से जाना जाता था। इस क्षेत्र जितने भी धरोहर होते थे वो इसी संघ्रालय में रखा जाता था |

 डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के प्रस्ताव पे किया गया था पटना संग्रहालय का निर्माण

पटना संग्रहालय को निर्माण सन 1917 में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के प्रस्ताव पे स्थापित किया गया था | सात मार्च 1929 को यह संग्रहालय आम लोगों के लिए खोल दिया गया। इसकी खासियत यह है कि मुगल काल में जो डिजाइन इस उकेरी गयी थी या बनी थी  उसमें अभी तक कोई बदलाव  नहीं हुआ है। जो खुद में एक इतिहास है।

मुगल काल का वो डिजाइन जो खुद में है एक इतिहास

पटना जो की भारत में बिहार की राजधानी है। इसे पाटलिपुत्र के नाम से भी जाना जाता है। पटना की स्थापना 490 ईसा पूर्व में मगध के राजा द्वारा की गई थी। यह अपनी सांस्कृतिक विरासत में समृद्ध है। शहर में कई पर्यटक आकर्षण हैं जैसे पटना साहिब गुरुद्वारा, गोलघर, दरभंगा हाउस, मनेरशरीफ दरगाह आदि। पटन संग्रहालय उन स्थानों में से एक है, जो लगभग सभी पर्यटकों और यात्रा करने वाले उत्साही लोगों की सूची में है। आइए जानते हैं म्यूजियम से जुड़े कुछ तथ्यों के बारे में।

पटना संग्रहालय का दूसरा नाम है जादूघर

पटना संग्रहालय सबसे पुराना और अच्छी तरह से संरक्षित संग्रहालय है जिसे लोकप्रिय रूप से “जादू  घर” भी कहा जाता  है। इसकी स्थापना बिहार और ओडिशा के पूर्व-गवर्नर सर एडवर्ड द्वारा की गई थी। यह बुध मार्ग, लोदीपुर, पटना, बिहार में स्थित है।इस शानदार संग्रहालय की वास्तुकला मुगलों और राजपुताना शैली के आधार पे बनी हुई है |  इसको बनाने का विचार बिहार और बंगाल के अलग होने के ठीक बाद आया।

पटना संग्रहालय जहाँ हिन्दू तथा बौद्ध धर्म की कई निशानियाँ मिलती है देखने को

इस संग्रहालय में विभिन्न ऐतिहासिक कलाकृतियों के साथ दो मंजिलें शामिल हैं। पटना संग्रहालय में प्राचीन पटना के हिन्दू तथा बौद्ध धर्म की कई निशानियाँ देखने को मिलती हैं। लगभग 20 करोड़ वर्ष पुराने पेड़ के तने का अवशेष यहाँ के  विशेष धरोहर के रूप में जाना जाता है।16 मीटर लंबा तने का अवशेष, भगवान बुद्ध की अस्थियाँ तथा दीदारगंज, पटना सिटी से प्राप्त यक्षिणी की मूर्ति भी यहाँ की विशेष धरोहर में शामिल  है। देखा जाए तो पटना का संग्रहालय ऐतिहासिक रूप से काफ़ी धनी है।

लगभग 50,000 से अधिक अद्वितीय कला वस्तुएं मिलती हैं देखने को

पटना संग्रहालय जहाँ  मौर्य और गुप्त काल की मूर्तियाँ  जो की पत्थर और लोहे की बनी हुई है टेराकॉटा, महात्मा बुद्ध, कुषाणका राख आदि अभी भी यहाँ संरक्षित है।इस संग्रहालय में लगभग 50,000 से अधिक अद्वितीय कला वस्तुएं देखने को मिलती हैं। ये कला वस्तुएं ब्रिटिश औपनिवेशिक काल और प्राचीन मध्य युग से भारतीय कला तथ्यों के अंतर्गत आती हैं।यह  संग्रहालय एक सुंदर पार्क से घिरा हुआ है तथा प्रथम विश्व युद्ध की तोप और 16 मीटर लंबे एक जीवाश्म पेड़ का निवास है, जो कि मिलियन वर्ष पुराना है और अब इसे दुनिया में सबसे लंबे समय तक जीवाश्म पेड़ के रूप में जाना जाता है।

शताब्दी स्मारक के नाम से जाना जाता है भगवान बुद्ध की अद्भुत मूर्ति और स्तूप को

पटना संग्रहालय में ब्रिटिश शासन के समय से कई अद्भुत चित्रों का संग्रह है जिसमें से कुछ चित्रों में भारत के हमारे प्रथम राष्ट्रपति डॉ। राजेंद्र प्रसाद के जीवन की कल्पना की गई है।यहाँ उपस्थित भगवान बुद्ध की अद्भुत मूर्ति और स्तूप को शताब्दी स्मारक के नाम से जाना जाता  है, जो संग्रहालय के एक कोने में स्थित है; हालांकि, संग्रहालय का सबसे लोकप्रिय संग्रह ” दीदारगंज यक्षी ” है जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की प्रतिमा है।

दीदारगंज यक्षी की प्रतिमा जिसे गंगा नदी के तट से  खोजा गया था

दीदारगंज यक्षी चौरीबर की एक उत्कृष्ट प्रतिमा है जिसे 1917 में पटना के दीदारगंज के पास गंगा नदी के तट पर खोजा गया था। पटना में कुछ अन्य संग्रहालय भी उपलब्ध हैं, फिर भी, पटना संग्रहालय पर्यटकों के बीच आकर्षण का केंद्र बना आ रहा है। यह संग्रहालय पटना, बिहार के पांच सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थानों में आता है। यह संग्रहालय कांस्य, सिक्के, थैला, वाद्य, वस्त्र और बहुत सी पुरातात्विक वस्तुओं को भी प्रदर्शित करता है।