मधुबनी के लौकही गांव  में आसमान से गिरा पत्थर कुछ दिनों पहले कौतुहल का विषय बना हुआ था |  22 जुलाई को मधुबनी के लौकही स्थित एक धान के खेत में आसमान से तेज गड़गड़ाहट साथ पत्थर गिरा जिससे शुरू में वहां के लोग  डर गए | 

13 किलग्राम वजन के इस पत्थर से अचंभित हो गए मधुबनी के स्थानीय लोग

बाद में पत्थर गिरे जगह पर खोजबीन करने पर जमीं में धंसे लगभग 13 किलग्राम वजन के इस पत्थर से अचंभित हो गए | इसमें चुंबकीय गुण हैं। इस पिंड को ग्रामीणों और किसानों ने जमीन में पांच फीट गहरे छेद से वस्तु को निकालने के लिए जमा हुए। फिर भी, जांच इस बात पर है कि क्या चट्टान जैसी वस्तु उल्कापिंड है या कुछ और। स्थानीय ग्रामीणों ने कहा कि वस्तु के प्रभाव से जमीन में पांच फुट का छेद हो गया।

वस्तु को जिला कोषागार में थोड़ी देर के लिए रखने के बाद रखा गया था। जिला मजिस्ट्रेट ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग को अलर्ट करने के बाद, इसे तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पटना में 1 एनी मार्ग स्थित सरकारी आवास में स्थानांतरित कर दिया।

मुख्यमंत्री आवास में नीतीश कुमार ने किया इस पत्थर का अवलोकन

मुख्यमंत्री आवास में नीतीश कुमार ने इस पत्थर का अवलोकन किया फिर उन्होंने मौके पर अपने  आवास में भूगर्भशास्त्री बुलाए गए जिनके अनुसार ये उल्का पिंड है |  इस आकाशीय पिंड के साथ मधुबनी के स्थानीय लोगों ने खूब तस्वीर खींची और लोग उस स्थान को भी देखने आ रहे जहाँ ये पिंड गिरा था |

भूगर्भशास्त्री के अनुसार इस पत्थर में लौह अयस्क, मैग्नेशियम और ऑल्विन जैसे तत्व हैं मौजूद

स्थानीय लोगों ने जब उस पत्थर में चुम्बक   सटाया तो यह पत्थर ने उस चुम्बक  को अपनी ओर आकर्षित कर लिया |  भूगर्भशास्त्री के अनुसार इस पथ्थर में लौह अयस्क, मैग्नेशियम और ऑल्विन जैसे तत्व हैं |

विज्ञानं एवं प्रौद्योगिकी विभाग को जांच पड़ताल के लिए सौपा गया ये पत्थर

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीते दिनों घोषणा की कि इस पत्थर को जांच पड़ताल के बाद बिहार संग्रहालय में रखा जाएगा  | अभी इस पत्थर को फ़िलहाल  विज्ञानं एवं प्रौद्योगिकी विभाग को जांच पड़ताल के लिए सौपा गया है |

पटना विश्वविद्यालय में भूगर्भशास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉक्टर अतुल आदित्य पांडेय  अनुसार  इस तरह की चीजों का गिरना एक सामान्य प्रक्रिया है |

बिहार में पहले भी मुजफ्फरपुर, मोतिहारी जिले में उल्कापिंड गिरने जैसी हो चुकी है घटना

दरअसल पृथ्वी और उसके ग्रह के चारों ओर बने प्लेटेनरी बॉडीज गुरुत्वाकर्षण से उल्कापिंड आकर्षित होते हैं ,अधिकतर मामलों में ये उल्कापिंड वायुमंडल से जब निकलते हैं तो इनकी गति इतनी तेज होती है कि ये कुछ देर में ही राख हो जाते हैं. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि ये उल्कापिंड गुरुत्वाकर्षण की वजह  धरती पर बिना जले या राख हुए धरती पर गिर जाते हैं | उनके मुताबिक बिहार में पहले भी मुजफ्फरपुर, मोतिहारी जिले में उल्कापिंड गिरने  की घटना हुई है |

धरती से डायनासोर जैसे भारी भरकम जानवरों के विलुप्त होने का कारण माना जाता है उल्कापिंड

उन्होंने आगे बताते हुए कहा की उल्कापिंड का अध्ययन करने से इसकी उम्र की जानकारी और इसके साथ ही पृथ्वी और उसके आसपास के ग्रहों में हो रहे हलचल का पता चलता है | |  उल्कापिंड में गर्मी  ज्यादा होती है | धरती से डायनासोर जैसे भारी भरकम जानवरों के विलुप्त होने का कारण  उल्कापिंड जाता है |

जिन किसानों ने यह देखा, उन्होंने कहा कि यह एक हल्के भूरे रंग की वस्तु है और जैसे ही यह जमीन पर गिरा, यह धुआं उठने देता है। वैज्ञानिकों द्वारा संभावित उल्कापिंड के रूप में इस खोज का विश्लेषण किया जा रहा है। उल्कापिंड धूल और चट्टान के कण हैं जो आमतौर पर जलते हैं क्योंकि वे पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरते हैं, उन लोगों के साथ जो उल्कापिंड के रूप में जाना जाता है।