दशरथ मांझी, एक ऐसा नाम जो इंसानी जज़्बे और जुनून की बेजोड़ उदाहरण  है | दशरथ मांझी नाम है उस दीवानगी का, जो प्रेम की खातिर ज़िद में बदली और तब तक चैन से नहीं बैठी, जब तक कि पहाड़ का सीना चीर न दिया | वर्ष 1960 से 1982 के बीच दिन-रात दशरथ मांझी के दिलो-दिमाग में एक ही चीज़ घर बना रखा था की  पहाड़ से अपनी पत्नी की मौत का बदला लेना है |  और 22 साल जारी रहे जुनून ने अपना नतीजा दिखाया और पहाड़ ने मांझी से हार मानकर 360 फुट लंबा, 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा रास्ता दे दिया |

22 वर्ष का इंतकाम

बिहार में गया के करीब गहलौर गांव में दशरथ मांझी के माउंटन मैन बनने का सफर उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी का ज़िक्र किए बिना अधूरी है  | गहलौर और अस्पताल के बीच खड़े जिद्दी पहाड़ की वजह से साल 1959 में उनकी बीवी फाल्गुनी देवी को वक़्त पर इलाज नहीं मिल सका और वो चल बसीं थी |  दशरथ मांझी काफी कम उम्र में अपने घर से भाग गए थे और धनबाद की कोयले की खानों में उन्होनें काम किया |  फिर वे अपने घर लौट आए और फाल्गुनी देवी से शादी की |  अपने पति के लिए खाना ले जाते समय उनकी पत्नी फाल्गुनी पहाड़ के दर्रे में गिर गयी और उनका निधन हो गया |  अगर फाल्गुनी देवी को अस्पताल ले जाया गया होता तो शायद वो बच जाती यह बात उनके मन में घर कर गई यहीं से शुरू हुआ दशरथ मांझी का इंतकाम |

अकेले पहाड़ का सीना चीड़ दिया

साल 1960 से 1982 के बीच दिन-रात दशरथ मांझी के दिलो-दिमाग में एक ही चीज़ ने कब्ज़ा कर रखा था की इस पहाड़ से पत्नी के मौत का बदला कैसे लें |  पत्नी के चले जाने के गम से टूटे दशरथ मांझी ने अपनी सारी ताकत बटोरी और पहाड़ के सीने पर वार करने का फैसला किया, पर  यह इतना आसान नहीं था |  शुरुआत में गांव वाले  उन्हें पागल तक कहा पर अपनी जिद के आगे  दशरथ मांझी ने गांव वालों के तानों को हावी नहीं होने दिया  उल्टे  गांव वालों के  तानों ने  दशरथ मांझी का  हौसला और बढ़ा दिया’. | पहाड़ से अपनी पत्नी की मौत का बदला लेना है दशरथ मांझी का यह  जूनून  22 साल जारी रहा तत्पश्तात  जुनून ने अपना नतीजा दिखाया और पहाड़ ने मांझी से हार मानकर 360 फुट लंबा, 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा रास्ता दे दिया |

दुनिया से चले गए पर जूनून की नई परिभाषा सीखा के गए

दशरथ मांझी अपने काम को 22 वर्षों (1960-1982) में पूरा किया |  इस सड़क से गया के अत्रि और वज़ीरगंज सेक्टर्स की दूरी 80  किमी से सिमटकर मात्र 15 किमी की हो गई | शुरू में तो दशरथ माँझी के प्रयास का मज़ाक उड़ाया गया पर उनके इस प्रयास ने गेहलौर के लोगों के जीवन को सरल बना दिया। हालांकि उन्होंने एक सुरक्षित पहाड़ को काटा, जो भारतीय वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम अनुसार दंडनीय है फिर भी उनका ये प्रयास सराहनीय है। बाद में मांझी ने कहा,” पहले-पहले गाँव वालों ने मुझपर ताने कसे लेकिन उनमें से कुछ ने मुझे खाना दीया और औज़ार खरीदने में मेरी सहायता भी की।”वर्ष 2007 में जब 73 बरस की उम्र में वो जब दुनिया छोड़ गए, तो पीछे रह गई पहाड़ पर लिखी उनकी वो कहानी, जो आने वाली कई पीढ़ियों को सबक सिखाती रहेगी |

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
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