हिन्दू परंपरा में देवी-देवताओं की पूजा में सवर्प्रथम पूजे जाने वाले भगवान गणपति बप्पा का त्योहार “गणेश चतुर्थी” 02/09/19 से आरंभ होने जा रहा है , जब बात गणपति बप्पा की हो तो जुबां पर एक ही स्थान का नाम आता है वो है “महाराष्ट्र” , यहाँ की गणेश चतुर्थी महोत्सव विश्वप्रसिद्ध है जिसके दर्शन के लिए लोग वर्षो इंतज़ार करते है , मुम्बई की धरती पर सबसे पौराणिक एवं भव्य गणेश पंडाल जहां स्थापित होता है वो है लालबाग के राजा ( King of Lalbagh ) गणपति बप्पा जिन्हें मन्नतों का राजा भी कहा जाता है ;

लोगों की आस्था इनसे इस क़दर जुड़ी है कि इनके दर्शन मात्र के लिए लोग अपना सब कुछ निछावर करने को तैयार रहते है , कहते है कि जो भी सच्चे दिल से बप्पा के दरबार मे जाता है , बप्पा उनकी मनोकामना जरूर पूरी करते है ; इस बार लालबाग के राजा ( King of Lalbagh ) का पंडाल का थीम हर साल के भाँति अलग है इस बार बप्पा ब्राह्मण (Space) की सैर पर है ; ये थीम इस लिए चुना गया क्योंकि अभी हाल के दिनों में ही इसरो (I.S.R.O) ने चंद्रयान-२ भेजकर दुनिया मे एक नया इतिहास काबिज़ किया है ।King of Lalbagh

King of Lalbagh
Lalbaghcha Raja

लालबाग के राजा ( King of Lalbagh ) का पंडाल, मूर्ति और भक्तों की भारी भीड़ एक महान विरासत का हिस्सा हैं। एक ऐसी विरासत जो आजादी के पहले से चली आ रही है। वही परंपरा, वही तौर-तरीका और वही आस्था। पिछले 82 सालों से लालबाग के राजा का दरबार यूं ही सज रहा है और ऐसे ही हर साल श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। वक्त के साथ बाहरी सजावट भले बदल गई हो, लेकिन आस्था का वही रूप आज भी कायम है। जो इस दरबार की स्थापना के समय था।

King of Lalbagh
First picture of lalbaghcha Raja in 1932

◆अद्धभुत है लालबागचा राजा King of Lalbagh (बप्पा) का इतिहास :

लालबाग का दरबार सजाने वाले सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल की स्थापना 1934 में हुई थी। मुंबई के दादर और परेल से सटा लालबाग इलाका तब मीलों से पटा पड़ा था। इस इलाके में मिल मजदूर, छोटे-मोटे दुकानदार और मछुआरे रहा करते थे। 1932 में यहां के पेरू चॉल बंद हो जाने से मछुआरों और दुकानदारों की कमाई का जरिया बंद हो गया था, वो खुले में सामान बेचने को मजबूर थे।
तब कुछ लोगों ने मिलकर अपनी मन्नतों को पूरा करने के लिए गणपति की पूजा शुरू की। धीरे-धीरे इस पूजा में आसपास के लोग भी शामिल होने लगे और लालबाग में बाजार खड़ा करने के लिए थोड़ा-बहुत चंदा भी देने लगे। दो साल बीतते-बीतते मछुआरों और दुकानदारों की मन्नत पूरी हो गई, उन्हें बाजार खड़ा करने के लिए जमीन मिल गई। तब उन लोगों ने भगवान के प्रति अपनी आस्था प्रकट करने के लिए 12 सितंबर 1934 को यहां गणपति की प्रतिमा की स्थापना की।
धीरे-धीरे लालबाग के इस गणपति की महिमा की दूर-दूर तक चर्चा होने लगी। मुंबई के अलग-अलग हिस्सों से यहां दर्शन के लिए श्रद्धालु उमड़ने लगे। तब लालबाग के गणपति को मराठी में नया नाम मिला ‘लालबाग चा राजा’ यानी लालबाग के राजा और सचमुच यहां के गणपति की शान किसी राजा से कम नहीं है। 1934 के बाद हर साल यहां एक नए गणपति की प्रतिमा स्थापित होने लगी।

King of Lalbagh
Paper cutting news of Lalbaghcha Raja – 1979

1934 से लेकर अब तक की इन सारी मूर्तियों में एक खास समानता है। इन्हें लालबाग में रहने वाले एक ही परिवार के मूर्तिकारों ने बनाया है। पिछले 8 दशकों से इलाके का कांबली परिवार ही लालबाग के राजा की मूर्ति बना रहा है। करीब 20 फीट ऊंची गणपति की मूर्ति बनाने का ये हुनर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच रहा है। फिलहाल इस परिवार की तीसरी पीढ़ी ये काम कर रही है। कांबली परिवार के सबसे बुजुर्ग शख्स 73 साल के रत्नाकर कांबली हैं, जिन्होंने अपने पिता से ये हुनर सीखा था।

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रत्नाकर कांबली के पिता पहले महाराष्ट्र में घूम-घूमकर मूर्तियां बनाते थे, लेकिन एक बार वो लालबाग पहुंचे तो फिर यहीं के होकर रह गए। आज इस परिवार के सहयोग के बिना लालबाग चा राजा के दरबार की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
लेकिन ऐसा नहीं है कि लालबाग चा राजा की महानता के पीछे सिर्फ मूर्ति की भव्यता है। लालबाग मंडल ने अपने गणपति को अहम बनाने के लिए समाज कल्याण से जुड़े कई काम किए हैं। बात चाहें देश के बंटवारे में बेघर लोगों की मदद की हो या फिर 1959 में बिहार में बाढ़ से मची तबाही की हो या फिर 1962 और 65 का युद्ध हो। हर मुश्किल घड़ी में इस पंडाल ने आर्थिक मदद की है और ये सिलसिला किसी ना किसी रूप में अभी तक जारी है।

◆लालबागचा राजा के भक्त सामाजिक कल्याण में भी अपनी भूमिका निभाते है :-

लालबाग के बप्पा के भक्त इस दुनिया मे करोड़ों की संख्या में मौजूद है , भक्ति एवं श्रद्धा के साथ-साथ बप्पा के भक्त सामाजिक कल्याण में भी अपनी भागीदारी निभाते है , लालबागचा राजा के दरबार मे लाखों भक्त आते है एवं अपनी इच्छानुसार बप्पा को दानस्वरूप कुछ भेंट देते है ; इससे सामाजिक एवं धर्मिक क्रियाकलाप दोनों संभव हो जाता है और यही कारण है कि लालबागचा राजा के भक्त हर समाजिक कल्याण दृष्टिकोण में शुरुआत से ही देश के साथ रहे है , आज़ादी के समय से बेघरों को घर मुहैया कराने से बिहार में आये 1959 के भीषण बाढ़ में राहत हेतू या फिर 62-65 का युद्ध दरम्यान हर मुश्किल परिस्थितियों में लालबागचा राजा के भक्त देश को तन-मन-धन सम्पूर्ण रूप से साथ दिया है ।।

King of Lalbagh

◆बड़े से बड़ा उद्योगपति – कलाकार भी लालबागचा राजा के दरबार में आशीर्वाद लेने हेतू आता है ;

हिन्दू परंपरा में सवर्प्रथम पूजे जाने वाले भगवान गणपति बप्पा के भक्त सम्पूर्ण देश मे ही नहीं विदेशों तक फैले हुए है और यही कारण है कि देश का आर्थिक राजधानी जाने-जानी वाली राजधानी मुम्बई में लालबागचा राजा के दर्शन के लिए देश से ही नही विदेशों से भी बड़े उद्योगपति , कलाकार आदि बप्पा के दर्शन हेतू उनके दरबार मे आते है ।

King of Lalbagh
Visarjan photo of lalbaghcha raja

◆लालबागचा राजा के विसर्जन में केवल मुम्बई ही नही पूरा  Maharashtra शामिल होता है :-

11 दिन भक्तों के बीच रहकर बप्पा का आखिर में विसर्जन समारोह होता है जिसमें देश से ही नही विदेशों से भी लोगों का जमावड़ा विसर्जन समारोह में रहता है , बप्पा का रूपरेखा जितनी अनोखी रहती है , बप्पा की विसर्जन यात्रा भी उतनी ही अनोखी रहती है , जहाँ अबीर-गुलाल के साथ नम आँखों से बप्पा की विदाई की जाती है ।।

subham Gupta

Associate Author at BiharStory.in
एक स्टोरी राइटर, जिसका मकसद सामाजिक गतिविधियों एवं अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक परिदृश्य को दिखाना ही नहीं बल्कि बदलाव के लिए सदैव प्रयासरत भी रहनाहै |
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