दिनांक – 05-08-19 को सरकार द्वारा एक ऐतिहासिक फ़ैसला लिया गया जिसमें कश्मीर में आज़ादी के वक्त से लागू धारा 370 आर्टिकल 35A को समाप्त कर दिया गया ; इस फैसले से पूरे देश मे लोगो मे काफी उत्साह है एवं कहीं – कहीं लोगो मे एक असंतोष की भावना भी दिखी जोकि प्रश्न के माध्यम से सामने आ रही थी इसकी चर्चा कभी विस्तार से करेंगे ।।
कश्मीर में जो घाटी के लोगो को जो मौलिक अधिकार मिला है वो उनको आधुनिक एवं औद्योगिकरण दोनों स्तरीय से पुनः रूप से अवगत कराएगा खासखर युवाओं के प्रति क्योंकि घाटी में आज तक युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेणास्रोत कार्य कुछ भी नही हुआ है हुआ है तो केवल नरसंहार एवं हिंसा इससे हम कैसे कह सकते है कि कश्मीर के युवाओं का भविष्य उज्ज्वल होगा ; कश्मीर 72 सालों से संघर्षो एवं बलिदानों का स्थान बन गया है इस धरती पर क्रियाकलापो का उदहारण बहुत कम ही मिलेगा क्योंकि ये अपने संघर्षो के लिए ज्यादा लोकप्रिय रहा है ; कश्मीर के अपने पूरे कार्यकाल में सबसे बड़ा काला दिन 1990 में आया था जब हजारों कश्मीरी पंडित जो कि कश्मीर के लोकल लोग थे उन्हें रूढ़िवादी भय के साये से डराकर उन्हें बेघर कर दिया गया था आज उसी चीज़ का पुनः रूप से विश्लेषण करेंगे ।।

◆कश्मीरी पंडित :-

कश्मीर घाटी के निवासी हिन्दुओं को काश्मीरी पण्डित या काश्मीरी ब्राह्मण कहते हैं। ये सभी ब्राह्मणमाने जाते हैं। सदियों से कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों को 1990 में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद की कारण से घाटी छोड़नी पड़ी या उन्हें जबरन निकाल दिया गया। पनुन कश्मीर काश्मीरी पंडितों का संगठन है।

◆कश्मीर का काला सच :-

कश्मीर में सेना की सख्ती और आतंकवादी हमलों के बीच एक आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-इस्लाम ने पुलवामा में कई जगह पोस्टर लगाए थे, जिनमें कहा गया है कि कश्मीरी पंडित या तो घाटी छोड़ दें या फिर मरने के लिए तैयार रहें। यहां ध्यान देने वाली बात है कि कश्मीर में साल 1990 में हथियारबंद आंदोलन शुरू होने के बाद से अब तक लाखों कश्मीरी पंडित अपना घर-बार छोड़ कर चले गए। उस वक्त हुए नरसंहार में सैकड़ों पंडितों का कत्लेआम हुआ था।
कश्मीर में हिंदुओं पर हमलों का सिलसिला 1989 में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी ने शुरू किया था। जिसने कश्मीर में इस्लामिक ड्रेस कोड लागू कर दिया। आतंकी संगठन का नारा था-  ‘हम सब एक, तुम भागो या मरो’। इसके बाद कश्मीरी पंडितों ने घाटी छोड़ दी।

करोड़ों के मालिक कश्मीरी पंडित अपनी पुश्तैनी जमीन जायदाद छोड़कर शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हो गए। हिंसा के उस दौर में 300 से अधिक हिंदू महिलाओं और पुरुषों की हत्या हुई थी। घाटी में कश्मीरी पंडितों के बुरे दिनों की शुरुआत 14 सितंबर 1989 से हुई थी।

भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और वकील कश्मीरी पंडित, तिलक लाल तप्लू की जेकेएलएफ ने हत्या कर दी गई। इसके बाद जस्टिस नीलकांत गंजू की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई। आतंक के उस दौर में अधिकतर हिंदू नेताओं को मौत की नींद सुला दिया गया।

◆जाने कश्मीर में कितनी नरसंहार हुई :-

1. डोडा नरसंहार- अगस्त 14, 1993 को बस रोककर 15 हिंदुओं की हत्या कर दी गई।

2. संग्रामपुर नरसंहार- मार्च 21, 1997 घर में घुसकर 7 कश्मीरी पंडितों को किडनैप कर मार डाला गया।

3. वंधामा नरसंहार- जनवरी 25, 1998 को हथियारबंद आतंकियों ने 4 कश्मीरी परिवार के 23 लोगों को गोलियों से भून डाला।

4. प्रानकोट नरसंहार- अप्रैल 17, 1998 को उधमपुर जिले के प्रानकोट गांव में एक कश्मीरी हिन्दू परिवार के 27 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया, इसमें 11 बच्चे भी शामिल थे। इस नरसंहार के बाद डर से पौनी और रियासी के 1000 हिंदुओं ने पलायन किया था।

5. 2000 में अनंतनाग के पहलगाम में 30 अमरनाथ यात्रियों की आतंकियों ने हत्या कर दी थी।

6. 20 मार्च 2000 चित्तीसिंघपोरा नरसंहार, होला मोहल्ला मना रहे 36 सिखों की गुरुद्वारे के सामने आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

7. 2001 में डोडा में 6 हिंदुओं की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

8. 2001 में जम्मू रेलवे स्टेशन नरसंहार, सेना के भेष में आतंकियों ने रेलवे स्टेशन पर गोलीबारी कर दी, इसमें 11 लोगों की मौत हो गई।

9. 2002 में जम्मू के रघुनाथ मंदिर पर आतंकियों ने दो बार हमला किया, पहला 30 मार्च और दूसरा 24 नवंबर को, इन दोनों हमलों में 15 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई।

10. 2002 में कासिम नगर नरसंहार में 29 हिन्दू मजदूरों को मार डाला गया। इनमें 13 महिलाएं और एक बच्चा शामिल था।

11. 2003 में नंदीमार्ग नरसंहार, पुलवामा जिले के नंदीमार्ग गांव में आतंकियों ने 24 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया था।

12. मार्च 1998 में मुस्लिम जिहादियों ने एक दूध पीते बच्चे का कत्ल किया जोकि निकृष्टता की पराकाष्ठा थी लेकिन छोटे बच्चे व महिलाएं, लड़कियां आतंकवादियों के सॉफ्ट टारगेट होते हैं क्योंकि वे अपने बचाव के उपाय भी नहीं कर सकते हैं।

13. 2 फरवरी 1990 को सामाजिक कार्यकर्ता सतीश टिक्कु की हत्या कर दी गई।

14. 23 फरवरी को कृषि विभाग के कर्मचारी अशोक की टांगों में गोली मारकर उन्हें घंटों तड़पाने के बाद सिर में गोली मारकर उनका कत्ल कर दिया गया। एक सप्ताह बाद इन मुस्लिम जिहादियों द्वारा नवीन सपरू का कत्ल कर दिया गया।

15. 27 फरवरी को तेजकिशन को इन जिहादियों ने घर से उठा लिया और तरह-तरह की यातनाएं देने के बाद उसका कत्ल कर उसे बड़गाम में पेड़ पर  लटका दिया।

16. 19 मार्च को इखवान-अल-मुसलमीन नामक संगठन के जिहादियों ने टेलीकाम इंजीनियर बीके गंजु को घर में घुसकर पड़ोसी मुसलमानों की सहायता से मारा। उसके बाद राज्य सूचना विभाग में सहायक उपदेशक पीएन हांडा का कत्ल किया गया।

17. 70 वर्षीय स्वरानंद और उनके 27 वर्षीय बेटे बीरेन्दर को मुस्लिम जिहादी घर से उठाकर अपने कैंप में ले गए। वहां उनकी पहले आंखें निकाली गईं, अंगुलियां काटी गईं फिर उनकी हत्या कर दी गई।

subham Gupta

Associate Author at BiharStory.in
एक स्टोरी राइटर, जिसका मकसद सामाजिक गतिविधियों एवं अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक परिदृश्य को दिखाना ही नहीं बल्कि बदलाव के लिए सदैव प्रयासरत भी रहनाहै |
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