इस मतलबी दुनियां में अपने लिए तो हर कोई जीता है, पर दूसरों के लिए जीने वाले बिरले हीं होते हैं | आज की हमारी कहानी भी एक ऐसे हीं असाधारण व्यक्ति की है जो गरीब छात्रों की परेशानियों को देख अपनी अच्छी-खासी नौकरी को लात मार कर मुफ्त में गरीब एवं जरूरतमन्द बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं | और साथ हीं बच्चों को पुस्तक की कमी महसूस न हो इसके लिए पुस्तकालय की भी व्यवस्था दे रखे हैं | अब तक 750 से भी अधिक बच्चे यहां से सरकारी नौकरियों में चयनित हो चुके हैं |  

इनके मार्गदर्शन में अब तक 750 से भी अधिक बच्चे सरकारी नौकरियों में चयनित हो चुके हैं

शिक्षाविद निरुप कुमार प्रधान

सामान्य परिवार से निकलकर कड़ी मेहनत के बाद बहुराष्ट्रीय कम्पनी में नौकरी पाने वाले निरुप कुमार प्रधान के परिवार को लग रहा था कि अब हमारी ग़रीबी दूर होगी लेकिन एक घटना ने निरुप कुमार प्रधान के जीवन  की दिशा हीं बदल डाली | एक बार अपनी नौकरी की छुट्टी के दौरान घर पर हीं थे समय था तो एक कोचिंग संस्थान में पढ़ाने लग गए |  उस समय तक निरुप कुमार प्रधान  शिक्षा के बाज़ारीकरण से वाक़िफ़ नही था लेकिन कोचिंग सेंटर में पढ़ाते समय मुझे शिक्षा के इस व्यवसाय के काले सच के बारे में पता चला | वहीँ पर एक ग़रीब बच्चे को कोचिंग से निकाल दिया था क्योंकि वो फ़ीस नही भर पा रहा था | जब निरुप कुमार प्रधान ने  उससे बात की तो उसके परिवार की आर्थिक स्थिति के बारे में पता चला |  कोचिंग सेंटर की नौकरी छोड़कर इस बच्चें को पढ़ाने का निर्णय किया |  वो अपने चार साथियों को भी पढ़ने के लिए मेरे पास लेकर आया, उन पाँच बच्चों से हमने शुरुआत की और अगले दो महीने की पढ़ाई के बाद उन पाँचों बच्चों का चयन सरकारी नौकरी के लिए हो गया |

शिक्षा के बाज़ारीकरण के दौर में इन्होंने मुफ़्त में ग़रीब एवं ज़रूरतमंद बच्चों को पढ़ाना शुरू किया

इस परिणाम ने निरुप कुमार प्रधान के  जीवन को बदल दिया

परिणाम की रात ही निरुप कुमार प्रधान ने  अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और ग़रीब बच्चों को पढ़ाने के लिए निश्चय किया. इसके बाद चक्रधरपुर में 2013 में ‘शिक्षा कोचिंग सेंटर’ की शुरुआत की | आदिवासी लड़के एवं लड़कियों के हॉस्टल में जाकर उन्हें मुफ़्त प्रतियोगी परीक्षा कोचिंग के बारे में बताया |

शिक्षा के बाज़ारीकरण के दौर में इन्होंने मुफ़्त में ग़रीब एवं ज़रूरतमंद बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, पाँच बच्चों से शुरू हुआ इनका सफ़र आज 750 से ज़्यादा बच्चों को सरकारी नौकरी दिला चुका हैं |  शिक्षा के साथ ही वह झारखंड के आदिवासी और ग्रामीण लोगों के हर सुख दुःख के साथी बने हुए हैं | आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिना कोई विज्ञापन के 84 विद्यार्थी पहले दिन पढ़ने आए | इस तरह यह सिलसिला शुरू हुआ और अब तक हज़ारों बच्चें मुफ़्त कोचिंग ग्रहण कर चुके हैं |  पश्चिमी सिंहभूम के साथ ही पटना, राँची और जमशेदपुर से भी बच्चें पढ़ने के लिए आते हैं |  अब तक 750 से ज़्यादा बच्चे झारखंड के साथ ही देश के विभिन्न राज्यों में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं |

आर्थिक रूप से असमर्थ बच्चों के लिए उन्होंने अपने नाम से एक निशुल्क लाइब्रेरी भी खोल रखी है जिसमें रोजाना 40-50 बच्चे इस लाइब्रेरी का लाभ उठाते हैं

वर्ष 2013 से दे रहे हैं शिक्षा

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर क़स्बे के रहने वाले निरूप कुमार ‘शिक्षा कोचिंग सेंटर’ नाम से मुफ़्त प्रतियोगी परीक्षा कोचिंग करवाते हैं | आपको बता दे कि प्रतियोगी परीक्षा तैयारी का सालाना व्यापार करोड़ों रुपए का हैं, लेकिन निरूप कुमार ग़रीब बच्चों को 2013 से हीं निःशुल्क  पढ़ा रहे हैं

इसके साथ ही वो ग़रीब बच्चों की फ़ीस, पाठ्य सामग्री एवं कपड़े की व्यवस्था भी करवाते हैं |  आर्थिक रूप से असमर्थ बच्चों के लिए उन्होंने अपने नाम से एक निशुल्क लाइब्रेरी भी खोल रखी है जिसमें रोजाना 40-50 बच्चे इस लाइब्रेरी का लाभ उठाते हैं |  आंशिक असमर्थ बच्चों का प्रतियोगी परीक्षा के फॉर्म भरने तक का खर्च भी उठाते हैं |

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
niraj kumar