‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना’ इस मशहूर गीत की पक्तियां वैसे तो हर इंसान के लिए हैं, पर हमारे समाज में रह रहे ट्रांसजेंडरों पर एक दम सटीक बैठती है | और इसका समझे बड़ा कारण है सामाजिक समानता आज के आधुनिक युग में भी लोग ट्रांसजेंडरों हेय दृष्टि से हीं देखते हैं, लोग बार-बार उनकी पहचान पर सवाल उठाते हैं, पर इस सब बातों को दरकिनार कर अपने लिए समाज में सम्मान से जीने की जंग जीत चुकी है ट्रांसजेंडर जोया | ज़ोया ने अपनी हिम्मत और जीवन अपने शर्तों पर जीने की चाह के बल पर बन गई मुंबई की पहली ट्रांसजेंडर पत्रकार

बहुत संघर्ष के बिच बिता जोया का बचपन

जब जोया 10 वर्ष की  हुई तो उसे एहसास हुआ की वो बाकी लड़कों से अलग है |इसी उम्र में पिता का हाथ सिर से उठ गया और मां शराब के आगोश में चली गई |  हर वक्त नशे में चूर मां हर किसी से लड़ लिया करती | पिता के चले जाने के बाद मां के साथ ज़ोया और उनके भाई-बहनों को घर से निकाल दिया गया और मां के बर्ताव ने उन्हें सड़कों, रेलवे स्टेशनों, और पुल पर सोने को मजबूर कर दिया | माँ शराब के नशे में लोगों से लड़ती थीं, और कई दिनों तक के लिए ग़ायब हो जाती थीं उस समय जोया को ये भी नहीं पता होता था कि वो वापस आएंगी भी या नहीं | ज़िंदगी ने जो कठनाइयां ज़ोया की राहों में डाली थीं उसमें से निकलते हुए, अपनी पहचान को सबसे छुपाते हुए ज़ोया की ज़िंदगी ने एक और करवट ली, पर इस बार उसकी ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए थी |

एक किन्नर को देख हुआ था एहसास

जब जोया 10 वर्ष की  हुई तो उसे एहसास हुआ की वो बाकी लड़कों से अलग है पर ट्रांसजेंडर होने का अहसास तब हुआ जब  जोया की  मां  जोया को दरगाह ले गईं, ये सोचकर कि शायद  कोई जादू-टोना हो गया है |  यहीं पर  पहली बार जोया ने एक किन्नर को देखा और उसके साथ बिताये अलप समय में हीं उसे अपनापन  महसूस हुआ और एक वर्ष के भीतर मुझे उसके समुदाय में स्वीकार कर लिया गया | जब यह बात जोया ने हिम्मत जूता कर मां को बताई तो  उसने जोया को अस्वीकार कर दिया साथ हीं  दोस्तों, परिवार और पड़ोसियों ने भी मुझे नहीं अपनाया | लोगों के घृणा के बावजूद मैंने अपने बाल बढ़ाए, लिपस्टिक लगाई और एक लड़की की तरह कपड़े पहनने लगा |  पर शायद अभी उसे अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और भयानक जंग लड़नी बाकी थी |

और शुरू हुआ जोया का संघर्ष

अब समाज ने जोया को  अलग-थलग कर दिया और पैसे की कमी के चलते हालात और ख़राब होने लगे | एक बार ट्रेन में सफर के दौरान एक पुलिस वाला जोया से  बहस करने लगा और  वह जोया और एक दूसरे व्यक्ति को कोच से पुलिस स्टेशन ले गया |  उसने जबरदस्ती हमारे कपड़े उतरवाए, हमें मारा और हमें एक-दूसरे के साथ शारिरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया, उसने ये सब कुछ रिकॉर्ड भी कर लिया था. जब मैंने शिकायत दर्ज करने की कोशिश की तो उसे अस्वीकार कर दिया गया | नौकरी की तलाश में ज़ोया ने हर जगह का दरवाज़ा खटखटाया पर हर तरफ उसको एक ही जवाब मिला कि ‘उसके जैसे’ लोगों को वो नौकरी पर नहीं रखते |

वक़्त फिर पलटा, जहां सारे दरवाज़े बंद हो गए थे ज़ोया के लिए एक नया दरवाज़ा खुला

कुछ कॉलेज के छात्रों ने जोया को  देखा और मुझे अपनी डॉक्यूमेंट्री में फ़ीचर करने के लिए कहा | जोया के लिए ये सब बिल्कुल अजीब था, लेकिन उन्होंने मेरी हिम्मत बांधी | वो मेरी ज़िंदगी का एक अहम मोड़ था – मुझे उसके बाद एक हिंदी धारावाहिक में काम भी करने को मिला! मैंने एक दो फ़िल्मों में भी काम किया और अवॉर्ड भी जीते |  एक समाचार चैनल के मालिक ने कहा कि वो मेरे काम से प्रभावित है, मैंने एक बहुत बड़ा जोख़िम लेते हुए उनसे नौकरी मांगी | मुझे बहुत आशचर्य हुआ की उन्होंने मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाय और  मेरा चयन हो गया और और इस तरह जोया  मुंबई की पहली ट्रांसजेंडर पत्रकार बनी |  जहां ज़ोया को हर जगह से निराशा मिल रही थी वहीं इस पूरी घटना ने उसके जीवन को नई दिशा दी |  उसको अपने प्रति नया नज़रिया दिया, उसको इस बात का एहसास दिलवाया कि ख़ुद से प्यार करना जितना मुश्किल है उतना ही ज़रू

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
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