इंसान स्वार्थ व खाने के लालच में कितना गिरता है उसका सबसे बढ़िया उदाहरण है मृत्युभोज | ये एक सामाजिक विडंबना हीं है जो समाज में यह कुरीति बर्षों से बेझिझक चली आ रही है । जानवर भी अपने किसी साथी के मरने पर मिलकर दुख प्रकट करते हैं, लेकिन हम इंसान  किसी व्यक्ति के मरने पर उसके साथी, सगे-संबंधी भोज करते हैं, मिठाइयां खाते हैं, चाहे भोज के लिए उसे कर्ज क्यों न लेना पड़े सामाजिक डर के कारण इस शर्मनाक परम्परा को निभाना पड़ता है |   यह एक सामाजिक बुराई है और इसको खत्म करने के लिए बिहार के कुछ गांव आगे भी आए है जो इस कुरीति को जड़ से ख़त्म करने की सोंच रखते हैं |

बिहार के इस गांव ने लिया मृत्युभोज न करने का संकल्प

खगड़िया जिले के रामपुर गांव से एक अनोखी मुहीम शुरू करने का संकल्प लिया गया है | गांव के सैकड़ों युवाओं ने बाबा थान में मृत्युभोज को खत्म करने के लिए सामूहिक रूप से संकल्प लिया | रामपुर के ग्रामीणों, विशेषकर युवाओं को बीते मंगलवार मुखिया कृष्णानंद यादव ने शपथ दिलवाई | इस मौके पर युवाओं ने कहा कि वे मृत्युभोज का बहिष्कार तो करेंगे ही साथ ही लोगों के बीच इसके खिलाफ जागरूकता अभियान भी चलाएंगे |

युवकों के अनुसार सामाजिक जागरूकता का यह कारवां कभी नहीं रुकेगा |  बता दें कि एक साल पूर्व गोगरी के ही उसरी के लोगों ने कटिहारी भोज नहीं खाने का निर्णय लिया था |  यह परंपरा अब भी वहां जारी है,कुल मिलाकर यह सामाजिक बदलाव की ओर इशारा कर रहा है |

मृत्युभोज से मुक्त है रामपुर

मृत्युभोज के वहिष्कार का खयाल रामपुर के लोगों के मन में काफी पहले से चल रहा था जिस पर रामपुर मुखिया की अगुवाई में ग्रामीणों की बैठक  हुई |  बैठक में गांव के लोगो को बताया गया  कि मृत्युभोज समाज में फैली कुरूति है |  यह समाज के लिए अभिशाप है. मुखिया यादव ने कहा कि किसी भी धर्मग्रंथ में मृत्युभोज का विधान नहीं है |  इस मौके पर मृत्युभोज बहिष्कार करने का प्रस्ताव लाया गया, इस प्रस्ताव को ग्रामीणों ने ध्वनिमत से पारित कर दिया | ग्रामीणों ने कहा कि रामपुर गांव में आज से मृत्युभोज पर पाबंदी रहेगी |

हर गांव को करनी होगी पहल

अगर किसी घर में खुशी का मौका हो, तो समझ आता है कि मिठाई बनाकर, खिलाकर खुशी का इजहार करें, खुशी जाहिर करें | लेकिन किसी व्यक्ति के मरने पर मिठाइयां परोसी जाएं, खाई जाएं, इस शर्मनाक परम्परा को मानवता की किस श्रेणी में रखा जाये | इंसान की गिरावट को मापने का पैमाना कहां खोजे, इस भोज के भी अलग-अलग तरीके हैं। कहीं पर यह एक ही दिन में किया जाता है। कहीं तीसरे दिन से शुरू होकर बारहवें-तेरहवें दिन तक चलता है। कई लोग श्मशान घाट से ही सीधे मृत्युभोज का सामान लाने निकल पड़ते हैं। ऐसे लोगो को तो  सलाह जी जाये  कि क्यों न वे श्मशान घाट पर ही टेंट लगाकर भोज  लें ताकि अन्य जानवर आपको गिद्ध से अलग समझने की भूल न कर बैठें | आज जिस तरह से बिहार के इस गांव ने आवाज उठाई और मृत्युभोज के वहिष्कार का संकल्प लिया  है, उसी तरह बिहार के हर गांव को इस तरह की पहल करनी चाहिए

niraj kumar
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