हमारा  पुरुष प्रधान समाज आज भले बेटियों के सुरक्षा को ले कर तरह-तरह के दावें करता हो पर सच्चाई यही है की आज भी हमारे समाज में कई जगहों पर बेटियों को अभिशाप समझा जाता है | मगर, राजस्‍थान की राजधानी जयपुर से 350 किमी दूर  का एक गांव ऐसा है जहां बेटियों के जन्‍म लेने पर खुशियां मनाई जाती हैं | राजसमंद जिले में स्थित पिपलांत्री गांव में जब किसी के घर में बेटी होती है, तो मां-बाप 111 पेड़ लगाकर बेटी के जन्म की ख़ुशियां मनाते हैं | गांव के सभी लोग मिलकर उस बच्ची के नाम पर 21 हजार रुपए जमा करके बच्ची के नाम से बैंक में खाता खुलवाते हैं | गांव में  बेटियों का जन्‍म प्रकृति के लिए भी वरदान साबित हो रहा है |

एक आदर्श गांव है पिपलांत्री

राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित पिपलांत्री गांव समाज की इस रुढ़ीवादी और छोटी से काफी आगे निकल चुका है। इस गांव में पैदा होने वाली लड़कियों को बोझ नहीं बल्कि उन्हें सौभाग्य के रुप में समझा जाता है, यहां बच्ची के जन्म पर बच्ची के नाम पर 21 हजार रुपए जमा करके बच्ची के नाम से बैंक में खाता खुलवाते हीं हैं इसके अलावा पंचायत की ओर से भी 10 हजार रुपए प्रोत्‍साहन राशि दी जाती है। इस परम्परा से यहां के लोग सिर्फ बेटी ही नहीं, बल्कि पर्यावरण को भी बचा रहे है। इस परम्परा की शुरुवात पिपलांत्री भूतपूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल ने अपनी बेटी की मृत्‍यु के बाद की थी।

देखते देखते यह वहां की परम्परा बन गई

बेटी की आत्‍मा की शांति और उसको श्रद्धाजंलि देने के लिए पालीवाल ने पूरे गांव में पेड़ लगाने शुरू किए थे। इसके बाद से यह गांव की परंपरा बन गया और बेटियों के जन्‍म को सम्‍मान की दृष्टि से देखा जाने लगा। पालिवाल का कार्यकाल 2010 में खत्‍म हो गया, लेकिन यह परंपरा आज भी जारी है। तब से गांव में बेटी के जन्‍म लेते ही गांव वाले मिलकर 111 पेड़ लगाते है। पेड़ों को दीमक से बचाने के लिए इन पेड़ों के आस-पास एलोवेरा का पौधा भी लगाते हैं। इस गांव की परम्परा ने समाज में बदलाव को साथ प्रकृति में भी बदलाव लाया है।

पहले समस्याओं का अंबार था इस गांव में

इस गांव की कामयाबी की कहानी शुरू होती है वर्ष 2005 से |  इस साल पंचायती चुनाव में गांव के ही एक नौजवान श्याम सुंदर पालीवाल गांव के सरपंच चुने गए |  उस समय पानी की समस्या से जूझ रहे इस गांव में हर कदम पर समस्याएं मुंह फैलाएं खड़ीं थीं |  बेरोजगार नौजवानों की फौज नशे की तरफ जा रही थी |  ऊंची-नीची पहाड़ी पर बसे इस गांव में सिंचाई के साधन नहीं होने से खेत बंजर हो रहे थे | बच्चों की शिक्षा का कोई स्थाई  इंतजाम नहीं था |

श्याम सुंदर पालीवाल ने सबसे पहले गांव में पानी की समस्या को दूर करने की ठानी और गांव के ही बेरोजगार नौजवानों को लेकर बरसाती पानी को इकट्ठा करने के लिए लगभग एक दर्जन स्थानों पर एनीकट तैयार करवाए |  गांव के नंगे जंगलों में पौधारोपण का काम शुरू करवाया और शिक्षा में सुधार के लिए स्कूल की इमारतों को दुरस्त करवाया. देखते ही देखते गांव की तस्वीर बदलने लगी |  बरसात का पानी एककटों में एकत्र होने लगा और कुछ वर्षों में जलस्तर ऊपर उठने लगा |

सूखे से जूझते गांव में पानी के झरने

आज ये हालात हैं कि जहां कभी जल स्तर 500 फुट की गहराई था, आज वहां पानी के सैकड़ों झरने फूट रहे हैं |  श्याम सुंदर बताते हैं कि उन्होंने स्वच्छता को लेकर काम शुरू किया और खुद ही झाड़ू लेकर सफाई करनी शुरू की |  उनकी देखादेखी गांव के अन्य लोग भी साफ-सफाई में आगे आने लगे |  और गांव में इतनी साफ-सफाई रहने लगी कि 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति ने पिपलांत्री को स्वच्छ ग्राम पंचायत के पुरस्कार से सम्मानित किया |