हमारे बिहार की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी की जिस व्यक्ति ने तैराकी में आठ पदक जीत बिहार का मान बढ़ाया और बदले में हमारे महान बिहार बिहार ने उस व्यक्ति को चाय बेचने पर मजबूर किया | और कहते हैं की बिहार के लोग ज्यादा मैडल नहीं जीत पाते | क्या खाक जीतेंगे मेडल, इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करने के बाद भी महज एक सरकारी नौकरी को तरसते इस इंसान की स्थिति को देख, जो खिलाडी आज पदक के लिए मेहनत कर रहा है वो भी अपना समय किसी दूसरे कामों में हीं लगाएगा |   

राष्टीय स्तर के तैराक हैं गोपाल प्रसाद यादव

गोपाल जी तैराकी में राष्ट्रीय स्तर पर एक-दो नहीं बल्कि पुरे आठ पदक जीत बिहार का सम्मान बढ़ा चुके हैं, पर आज पटना के शिक्षा की मंडी कहे जाने वाले नया  टोला के नुक्कड़ पर वर्ष 1998 से चाय बेचते हैं और आज यही इनकी पहचान है | कहानी यही ख़त्म नहीं होती- गोपाल प्रसाद के दो बेटे हैं सोनू कुमार और सन्नी कुमार और कमाल की बात यह है की ये दोनों भी अच्छे तैराक हैं लेकिन अपने पिता की तैराकी की वजह से हुई हालत को देख तैराकी से किनारा हो गए

तीन वर्ष में आठ पदक

वर्ष 1987 से 1989  तक लगातार तीन वर्ष बिहार को दो स्वर्ण समेत कुल आठ पदक दिलाने वाले गोपाल प्रसाद यादव पैसे के आभाव में 1990 के प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले पाए थे क्यों की उस समय खाने के नाम पर महज दस रूपए हीं मिलते थे | इस बीच गोपाल प्रसाद जी अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भी भाग लिए पर चौथे स्थान पर रहें | इस प्रतियोगिता में गोपान जी के पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण था की वो तैराकी गंगा नदी में करते थे और वहाँ स्विमिंग पूल में करना पड़ा था |

फाइल उठा कर फेंक देते थे अफसर

वर्ष 1990 में गोपाल जी के घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई, खाने को घर में अनाज तक नहीं था तब उन्होंने सरकारी नौकरी के लिए हांथ-पांव मारना शुरू किया , इसी क्रम में वे पोस्टल विभाग की नौकरी के लिए संत माइकल स्कुल में इंटरव्यू देने गये मगर वहां के अधिकारी फाइल उठा कर फेंक दिए

मुख्य मंत्री से मिला था आश्वासन पर नहीं मिली नौकरी

गोपाल जी जब स्टाल लगाए तो दर्जनों पत्रिका में उनका लेख छपा था उत्सुकता वस् तल्कालिक मुख्य मंत्री लालू प्रसाद यादव भी उनके स्टाल पर आये और उन्हें  अपने साथ बैठा कर सचिवालय ले गए और बोले की बहुत जल्द आपको नौकरी के बुलावे का पत्र आएगा पर उनका वादा भी ढाक के तीन पात हीं साबित हुई और आज भी गोपाल जी वही नया टोला के नुक्कड़ पर चाय बेचते हैं

आज चाय का स्टाल हीं है उनकी पहचान

गोपाल जी के चाय स्टाल पर जो कोई भी आता वह टंगे मैडल देख स्तब्ध रह जाता, पर गोपाल जी सब देख मन ही मन मुस्कुराते और सबको चाय पिलाते वो भी महज पांच रूपए में | नाम कमाने के शौकीन गोपाल प्रसाद जी वर्ष 1998 से निरंतर लोगों को प्यार से बेहतरीन चाय बना कर पिला रहे हैं और कहते हैं की एक बार मेरे हाँथ की बानी चाय पी लीजिये हम बार-बार याद आएंगे |

आज भी देते हैं लोगों को मुफ्त में प्रशिक्षण

भले आज गोपाल जी की हालात तैराकी के अनुकूल नहीं है पर उन्होंने तैराकी नहीं छोड़ी | यह तैराकी के प्रति उनका असीम प्यार हीं है की वे हर रविवार लोगों को निशुल्क तैराकी के गुण सिखाते हैं